सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली, जब्त वाहनों को थाने में लंबे समय तक रखने पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती।
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सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली, जब्त वाहनों को थाने में लंबे समय तक रखने पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती। |
मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी और अंतरिम सुपुर्दगी पर जोर, मालिकों को राहत की उम्मीद।
नई दिल्ली। पुलिस द्वारा किसी मामले में जब्त किए गए वाहनों को लंबे समय तक थाने या खुले परिसर में खड़ा रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया के तहत शीघ्र कार्रवाई पर जोर दिया है। कोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक वाहन को पुलिस के कब्जे में रखना हमेशा उचित नहीं है, क्योंकि खुले में खड़े रहने से वाहन खराब होता है और उसकी कीमत लगातार घटती रहती है।
7 जनवरी 2025 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित वाहन को मुकदमे के दौरान अंतरिम रूप से सुपुर्द करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने वाहन की पहचान के लिए फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग तथा आवश्यक दस्तावेज तैयार कराने की व्यवस्था भी बताई।
सुप्रीम कोर्ट के इस दृष्टिकोण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब्त वाहन वर्षों तक थानों में पड़े रहकर कबाड़ न बन जाएं। वाहन मालिकों के लिए इसका महत्व इसलिए भी है कि कई मामलों में वाहन उनकी रोजी-रोटी का साधन होता है।
वहीं, आपराधिक प्रक्रिया के तहत जब्ती की सूचना संबंधित मजिस्ट्रेट को देने का प्रावधान भी मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में इस प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, वाहन की सुपुर्दगी स्वतः या हर मामले में बिना शर्त नहीं होती। संबंधित अदालत मामले के तथ्यों, अपराध की प्रकृति और वाहन की आवश्यकता को देखते हुए शर्तों के साथ अंतरिम सुपुर्दगी का आदेश दे सकती है।
मुख्य बात: जब्त वाहन को लंबे समय तक पुलिस परिसर में रखने के बजाय कानून के अनुसार अदालत के समक्ष पेश कर उसके संरक्षण और अंतरिम सुपुर्दगी पर शीघ्र निर्णय लेना महत्वपूर्ण है।
यह फैसला Bishwajit Dey बनाम State of Assam, Criminal Appeal No. 87 of 2025, जो SLP (Crl.) No. 13370 of 2024 से संबंधित था, में आया। मामले में एक ट्रक को NDPS Act के तहत जब्त किया गया था। ट्रक मालिक को मामले में आरोपी नहीं बनाया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि NDPS Act में जब्त वाहन की अंतरिम वापसी पर कोई विशेष पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। |
अदालत ने CrPC की धारा 451 और 457 के तहत न्यायालय को जब्त संपत्ति की अंतरिम अभिरक्षा देने की शक्ति का उल्लेख किया।
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पीठ ने व्यापक रूप से कहा कि यदि वाहन के मालिक या उसके एजेंट पर अपराध में संलिप्तता का आरोप नहीं है, तो वाहन को सामान्यतः सुपरदारी पर अंतरिम रूप से छोड़ा जाना चाहिए, हालांकि संबंधित ट्रायल कोर्ट मामले के तथ्यों के आधार पर अलग निर्णय ले सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने वाहन छोड़ने से पहले उसकी वीडियोग्राफी और स्टिल फोटोग्राफी, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य जरूरी जानकारी दर्ज करने का निर्देश दिया। मालिक को वाहन बेचने या स्वामित्व हस्तांतरित करने से रोकने तथा अदालत के निर्देश पर वाहन पेश करने की शर्त भी लगाई जा सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस की अभिरक्षा में वाहन लंबे समय तक खुले में पड़ा रहने से वह खराब हो सकता है और उसका मूल्य घट सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में उचित शर्तों के साथ अंतरिम सुपुर्दगी वाहन मालिक, वित्तीय संस्था और व्यापक रूप से समाज—तीनों के लिए उपयोगी हो सकती है।
महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति: यह फैसला यह नहीं कहता कि हर जब्त वाहन को स्वतः और तुरंत मालिक को वापस करना अनिवार्य है। सुपुर्दगी का निर्णय संबंधित अदालत मामले के तथ्यों, अपराध की प्रकृति और मालिक की भूमिका को देखते हुए शर्तों के साथ करेगी। फैसले में ट्रायल कोर्ट को परिस्थितियों के अनुसार अलग दृष्टिकोण अपनाने की गुंजाइश भी दी गई है।
Supreme Court of India के हालिया आदेशों में जब्त वाहनों को लंबे समय तक थाने में खड़ा रखने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के तहत उनके निस्तारण/अंतरिम सुपुर्दगी पर जोर दिया गया है। हालांकि, आपके बताए शब्दों में “हर जब्त गाड़ी को अविलंब मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत कर मालिक को वाहन उपलब्ध कराया जाए” जैसा कोई सार्वभौमिक नया आदेश मुझे आधिकारिक रिकॉर्ड में नहीं मिला। 7 जनवरी 2025 के एक फैसले में कोर्ट ने कहा था कि वाहन को मुकदमे के अंत तक पुलिस के कब्जे में रखना उपयोगी नहीं है और वाहन को अंतरिम रूप से सुपुर्द किया जा सकता है।
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