नई दिल्ली: लोकसभा: विधानसभा: विधान परिषद:विवाद और बहस: एक व्यक्ति 5–10 साल राजनीति में रहकर दो स्रोतों से पेंशन पा सकता है,जबकि एक कर्मचारी 30–40 साल बाद भी N P S में अनिश्चित पेंशन पाता है

नई दिल्ली: लोकसभा: विधानसभा:विधानपरिषद : एक व्यक्ति 5–10 साल राजनीति में रहकर दो स्रोतों से पेंशन पा सकता है जबकि एक कर्मचारी 30–40 साल बाद भी N P S में अनिश्चित पेंशन पाता है।
लोकसभा में जब पेंशन बढ़ने की बात आती है तो सभी सांसद एक बार में हाथ उठा देता है। कोई विरोध नहीं होता है। लेकिन रेलवे कुली की बातें आती है तो सांसद, राज्य सभा के सदस्य मौन क्यों हो जाते हैं।

“असमानता” या “विशेषाधिकार” का मुद्दा कहा जाता है,क्या 5 साल सेवा करने वाले जनप्रतिनिधि को पेंशन मिलनी चाहिए और 30–40 साल काम करने वाले कर्मचारी को गारंटीड पेंशन क्यों नहीं।
विधानसभा के सभी सदस्यों का भी यही हाल है।

तुलना समझिए:-

मुद्दा                सांसद/विधायक।          सरकारी कर्मचारी

न्यूनतम सेवा।                  5 साल                30–40 साल
पेंशन                ₹31,000 से शुरू।      N P S में तय नहीं
योगदान।                    नहीं                 हाँ।        (वेतन से)
जोखिम                     नहीं                    मार्केट पर निर्भर

M P और M L A दोनों रहे हों तो क्या  होता है:-   सांसद की पेंशन सांसद वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम 1954 से मिलती है, जबकि विधायक (M L A)  की पेंशन राज्य के अपने कानूनों से तय होती है। सिद्धांत   रूप में:    अगर कोई व्यक्ति पहले M L A और बाद में M P   रहा है   और दोनों के लिए पात्रता पूरी करता है तो वह  दोनों    स्रोतों से पेंशन का दावा कर सकता है।

सामान्य पैटर्न (अधिकतर राज्यों में)     1 टर्म (5 साल) → बेस पेंशन हर अतिरिक्त टर्म/साल पेंशन बढ़ती है कई जगह पहले एक से ज्यादा बार चुनाव जीतने पर      अलग-अलग पेंशन जोड़ दी जाती है।

एक कड़वा     लेकिन     सच निष्कर्ष: सांसद/विधायक की पेंशन कम समय    में और गारंटीड है कर्मचारियों की पेंशन लंबी सेवा + योगदान+ जोखिम पर आधारित है इसी वजह से यह मुद्दा देश में बार-बार उठता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें