“असमानता” या “विशेषाधिकार” का मुद्दा कहा जाता है,क्या 5 साल सेवा करने वाले जनप्रतिनिधि को पेंशन मिलनी चाहिए और 30–40 साल काम करने वाले कर्मचारी को गारंटीड पेंशन क्यों नहीं। |
| विधानसभा के सभी सदस्यों का भी यही हाल है। |
तुलना समझिए:-
मुद्दा सांसद/विधायक। सरकारी कर्मचारी
न्यूनतम सेवा। 5 साल 30–40 साल
पेंशन ₹31,000 से शुरू। N P S में तय नहीं
योगदान। नहीं हाँ। (वेतन से)
जोखिम नहीं मार्केट पर निर्भर
M P और M L A दोनों रहे हों तो क्या होता है:- सांसद की पेंशन सांसद वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम 1954 से मिलती है, जबकि विधायक (M L A) की पेंशन राज्य के अपने कानूनों से तय होती है। सिद्धांत रूप में: अगर कोई व्यक्ति पहले M L A और बाद में M P रहा है और दोनों के लिए पात्रता पूरी करता है तो वह दोनों स्रोतों से पेंशन का दावा कर सकता है।
सामान्य पैटर्न (अधिकतर राज्यों में) 1 टर्म (5 साल) → बेस पेंशन हर अतिरिक्त टर्म/साल पेंशन बढ़ती है कई जगह पहले एक से ज्यादा बार चुनाव जीतने पर अलग-अलग पेंशन जोड़ दी जाती है।
एक कड़वा लेकिन सच निष्कर्ष: सांसद/विधायक की पेंशन कम समय में और गारंटीड है कर्मचारियों की पेंशन लंबी सेवा + योगदान+ जोखिम पर आधारित है इसी वजह से यह मुद्दा देश में बार-बार उठता है।
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