नई दिल्ली:भारत रूस से तेल कैसे खरीदता है जबकि उस पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं।

नई दिल्ली:भारत रूस से तेल कैसे खरीदता है जबकि उस पर पश्चिमी प्रतिबंध हैं।

भारत रूस से तेल इसलिए खरीद पाता है क्योंकि वह प्राइस कैप नियम के भीतर सौदे करता है वैकल्पिक जहाज़ और भुगतान प्रणाली का उपयोग होता है भारत ने रूस पर खुद प्रतिबंध नहीं लगाए हैं। भारत के लिए रूस से तेल खरीदना आर्थिक और रणनीतिक—दोनों तरह से फायदेमंद रहा है, लेकिन इससे कभी-कभी अमेरिका के साथ कूटनीतिक तनाव भी पैदा होता है।

भारत को रूस से तेल खरीदने से क्या फायदा होता है।

1. सस्ता तेल मिलता है। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद उसने अपना कच्चा तेल सस्ता बेचना शुरू किया। भारत को कई बार $10–20 प्रति बैरल तक सस्ता तेल मिला इससे भारत की रिफाइनरियों की लागत कम होती है।

2. पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों पर दबाव कम: भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। सस्ता रूसी तेल मिलने से देश में ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। इससे महंगाई भी कुछ हद तक कम रहती है।

रिफाइनरियों को बड़ा मुनाफा:-भारत की रिफाइनरी जैसे: रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन वाइल कोरपोरेशन सस्ता कच्चा तेल खरीदकर उसे प्रोसेस करके यूरोप और अन्य देशों को डीज़ल, पेट्रोल और जेट फ्यूल बेचती हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त मुनाफा मिलता है।

4. ऊर्जा सुरक्षा:भारत पहले मध्य-पूर्व पर बहुत निर्भर था अब रूस से तेल लेने से सप्लाई के स्रोत बढ़ गए किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई।

अमेरिका-भारत रिश्तों पर इसका क्या असर पड़ता है

1. अमेरिका को असहजता युनाइटेड स्टेट्स चाहता था कि दुनिया रूस से तेल कम खरीदे ताकि रूस की युद्ध अर्थ व्यवस्था कमजोर हो (खासकर रूस युक्रेन युद्ध के बाद) इसलिए शुरुआत में उसने भारत पर दबाव डाला।

2. लेकिन भारत के लिए अपवाद भी अमेरिका यह भी समझता है कि भारत एक बड़ा रणनीतिक साझेदार है चीन के मुकाबले क्षेत्रीय संतुलन में भारत अहम है।इसलिए उसने भारत पर कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए। व्यावहारिक समझौता:अब स्थिति यह है कि अमेरिका भारत से पूरी तरह तेल बंद करने की मांग नहीं करता बल्कि चाहता है कि खरीद कीमत सीमा प्राइज कैंप के अंदर हो।

वर्तमान स्थिति (संक्षेप में) India रूस से तेल खरीदकर अरबों डॉलर बचाता है। युनाइटेड स्टेट्स को यह पूरी तरह पसंद नहीं, लेकिन रणनीतिक रिश्तों के कारण वह इसे सहन करता है। दोनों देशों के रिश्ते कुल मिलाकर अभी भी मजबूत हैं।

दिलचस्प तथ्य:-2021 से पहले भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 1% से भी कम थी, लेकिन 2023–2025 में कई महीनों में यह 30–40% तक पहुंच गई।







दुबई/ईरान:अमेरिका और ईरान युद्ध में कितने देश शामिल हो चुके हैं या 15 दिनों में किस-किस शहर पर सबसे बड़े हमले हुए हैं।

दुबई/ईरान:अमेरिका और ईरान युद्ध में कितने देश शामिल हो चुके हैं या 15 दिनों में किस-किस शहर पर सबसे बड़े हमले हुए हैं।

युद्ध में अब तक कितने देश शामिल/प्रभावित:मुख्य रूप से दो पक्ष बन गए हैं। अमेरिका-इजराइल पक्ष:- युनाइटेड स्टेट्, इजराइल युनाइटेड किंगडम फ्रांस, जर्मनी, United States Israel,United Kingdom,France,Germany,JordanSaudi Arabia United Arab Emirates,Qatar, Kuwait,Bahrain इनमें से कई देशों ने अमेरिका को सैन्य ठिकाने, एयरबेस और रक्षा समर्थन दिया है। ईरान के समर्थन में: Iran,Russia (इंटेलिजेंस/सहयोग) China (राजनयिक और सीमित मदद) क्षेत्रीय सहयोगी गुट,Hezbollah (लेबनान) Hamas (फिलिस्तीन) Houthi Movement (यमन) रूस और चीन ने सीधे सेना नहीं भेजी लेकिन सूचना और कूटनीतिक सहयोग दिया है।कुल मिलाकर: 10–15 देश सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित/शामिल माने जा रहे हैं।15 दिनों में जिन शहरों पर बड़े हमले हुए। युद्ध अब कई देशों के शहरों तक फैल चुका है।ईरान,Tehran – बड़े एयरस्ट्राइक,Isfahan – परमाणु साइट पर हमला,इजराइल,Tel Aviv – मिसाइल हमले Haifa – ड्रोन/रॉकेट,UAE,Dubai – मिसाइल/ड्रोन गिरने की घटनाए एयर डिफेंस सक्रिय,सऊदी अरब:Riyadh – ड्रोन और मिसाइल खतरा इराक, बगदाद अमेरिकी दूतावास पर हमला, अरबील सैन्य ठिकाने निशाना, लेबनान,Beirut – इजराइली एयरस्ट्राइक,कुवैत कुवैत सीटी अमेरिकी बेस पर हमले,बहरीन,मनामा,अमेरिकी नौसैनिक बेस खतरे में है, निष्कर्ष:-युद्ध अब केवल ईरान-इजराइल तक सीमित नहीं है। यह पूरे मध्य-पूर्व (गल्फ रीजन) में फैल चुका है। अगर नए देश सीधे लड़ाई में उतरते हैं, तो स्थिति क्षेत्रीय या वैश्विक युद्ध में बदल रहा है।



बिहार/बेगुसराय/बरौनी: माता-पिता अपने बच्चों के उपर 15-20 लाख खर्च करके इंजिनियर बनाते हैं कर्ज से मुक्ति नहीं मिल पाती है इसका रोड मैप तैयार कर जानकारी दे रहा हूं।

बिहार बेगुसराय बरौनी: माता-पिता अपने बच्चों के उपर 15-20 लाख खर्च करके इंजिनियर बनाते हैं कर्ज से मुक्ति नहीं मिल पाती है इसका रोड मैप तैयार कर जानकारी दे रहा हूं।

पढ़ाई में बहुत खर्च, लेकिन शुरुआती नौकरी कम सैलरी की। 15–20 लाख का कर्ज सुनकर डर लगना स्वाभाविक है, लेकिन सही योजना से इससे बाहर निकला जा सकता है। मैं आपको कुछ व्यावहारिक तरीके बता रहा हूँ। 

सबसे पहले कर्ज का सही प्लान बनाइए: कुल कर्ज: 15–20 लाख अगर ब्याज ~8–10% है और आप 10 साल में चुकाते हैं, तो लगभग 20–25 हजार EMI बन सकती है। अगर आपकी सैलरी अभी 20–25 हजार है, तो शुरुआत में EMI कम रखें,लोन अवधि बढ़वा लें (10–15 साल इससे EMI लगभग 12–15 हजार तक आ सकती है।

सैलरी बढ़ाना सबसे जरूरी है: इंजीनियरिंग में शुरुआती नौकरी कम मिलती है, लेकिन 2–4 साल में तेजी से बढ़ सकती है।

इन चीजों पर काम करें:- स्किल बढ़ाएँ (Coding, Data Analysis, Automation आदि) नई टेक्नोलॉजी सीखें

उदाहरण:-Python,AutoCAD,SolidWorks।इन स्किल्स से 30–60 हजार तक नौकरी मिल सकती है।

साइड इनकम शुरू करें:जब सैलरी कम हो तो दूसरी कमाई बहुत मदद करती है।

कुछ विकल्प:-ऑनलाइन फ्रीलांसिंग,बच्चों को मैथ्स / फिजिक्स ट्यूशन,ऑनलाइन कोर्स पढ़ाना,छोटे YouTube / ब्लॉग शुरू करना अगर महीने में 5–10 हजार भी extra आ जाए तो कर्ज जल्दी कम होगा।

खर्च कम रखें (पहले 3–4 साल) बाइक/फोन जैसी बड़ी चीजें अभी न खरीदें किराया और लाइफस्टाइल कम रखें,जो भी बोनस मिले सीधा लोन में डाल दें।

सरकारी नौकरी की तैयारी भी विकल्प है: कई इंजीनियर बाद में इनकी तैयारी करते हैं: Union Public Service Commission (Engineering Services) Staff Selection Commission (JE) ,Railway Recruitment Board (JE) इनमें सैलरी 40–80 हजार+ हो सकती है।

सच्चाई:- आज 20–25 हजार की नौकरी है, लेकिन अगर आप 5–6 साल लगातार मेहनत करें तो 60 हजार – 1 लाख तक पहुंचना बिल्कुल संभव है। तब 15–20 लाख का कर्ज 2–4 साल में खत्म हो सकता है।


वाशिंगटन एजेंसी: अमेरिका: डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति से भारत-अमेरिका व्यापार (कितने अरब डॉलर) पर कितना असर पड़ा।

वाशिंगटन एजेंसी: अमेरिका: डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति से भारत-अमेरिका व्यापार (कितने अरब डॉलर) पर कितना असर पड़ा।

भारत सरकार सोई हुई थी

ट्रम्प की टैरिफ नीति के कारण भारत-अमेरिका व्यापार में करीब 26 अरब डॉलर तक का संभावित नुकसान और कई सेक्टरों में 30–37% तक निर्यात गिरावट का अनुमान लगाया गया है।

भारत-अमेरिका कुल व्यापार:- 212 अरब डॉलर भारत को अमेरिका के साथ लगभग 40 अरब डॉलर का व्यापार लाभ (Trade Surplus) है क्योंकि भारत ज्यादा निर्यात करता है।

अमेरिका से भारत में आने वाले बड़े सेक्टर(१)क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम उत्पाद लगभग 4–5 अरब डॉलर कोयला और ऊर्जा संसाधन एयरक्राफ्ट और रक्षा उपकरण इलेक्ट्रिक मशीनरी कट और पॉलिश्ड डायमंड ये भारत के प्रमुख आयात हैं।

भारत से अमेरिका को जाने वाले सबसे बड़े सेक्टर:लेक्ट्रिकल मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स,लगभग 15.9 अरब डॉलर,मोबाइल, टेलीकॉम उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स। फार्मास्युटिकल (दवाइयाँ) लगभग 9–10 अरब डॉलर जेनेरिक दवाओं में भारत बड़ा सप्लायर है।जेम्स और ज्वेलरी लगभग 9–10 अरब डॉलर हीरे और कीमती पत्थर। इंजीनियरिंग और मशीनरी भारी मशीन, ऑटो पार्ट्स, औद्योगिक उपकरण। टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट कपड़े, सूती परिधान। पेट्रोलियम उत्पाद और केमिकल रिफाइंड पेट्रोलियम, ऑर्गेनिक केमिकल।

भारत-अमेरिका कुल व्यापार:- लगभग $130–150 अरब टैरिफ से प्रभावित संभावित व्यापार: लगभग $10 अरब से $64 अरब के बीच (सेक्टर और टैरिफ स्तर पर निर्भर) कुछ अवधि में भारत के अमेरिका को निर्यात में लगभग 22% गिरावट भी देखी गई।

व्यापार पर कितना असर पड़ा:-अमेरिकी टैरिफ से भारत के अमेरिका को निर्यात में लगभग 22% गिरावट देखी गई। अनुमान है कि अमेरिकी टैरिफ भारत के लगभग $64 अरब तक के निर्यात को प्रभावित कर सकते थे।अगर केवल 10% निर्यात पर भी टैरिफ लागू हो, तो लगभग $10 अरब से अधिक का व्यापार सीधे प्रभावित हो सकता है।

किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर:-टैरिफ से मुख्य रूप से ये भारतीय निर्यात प्रभावित हुए।(१) टेक्सटाइल और गारमेंट(२) फार्मास्यूटिकल्स (३) जेम्स-ज्वेलरी (४)ऑटो पार्ट्स(५) इलेक्ट्रॉनिक्स।

ट्रम्प की टैरिफ नीति क्या थी: इसका कारण बताया गया: अमेरिका का भारत के साथ $45-58 अरब का व्यापार घाटा। भारत के रूसी तेल खरीदने और उच्च आयात शुल्क को लेकर अमेरिकी नाराज़गी।अमेरिका ने भारत के कई उत्पादों पर 25% से 50% तक टैरिफ लगाने की घोषणा की।

भारत-अमेरिका कुल व्यापार (अरब डॉलर में): 2024–25 के आसपास भारत-अमेरिका कुल व्यापार (goods + services) लगभग $130–132 अरब तक पहुँच गया था। केवल goods trade (सामानों का व्यापार) 2025 में लगभग $149.4 अरब था। अमेरिका को भारत के निर्यात $100 अरब से अधिक थे।








वाशिंगटन: अमेरिका: भारत-अमेरिका व्यापार 2030 तक 500 अरब डॉलर कैसे पहुंच सकता है।

वाशिंगटन: अमेरिका: भारत-अमेरिका व्यापार 2030 तक 500 अरब डॉलर कैसे पहुंच सकता है।

भारत और अमेरिका समझौता

अमेरिका के वाशिंगटन में हुई बातचीत के बाद भारत और अमेरिका ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। इसे अक्सर “Mission-500” कहा जाता है।अभी दोनों देशों के बीच व्यापार इससे काफी कम है, इसलिए इसे बढ़ाने के लिए कई बड़े कदम प्रस्तावित किए गए हैं।

बड़े पैमाने पर अमेरिकी सामान की खरीद: भारत अगले कुछ वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा, विमान, तकनीक और कच्चे माल की बड़ी खरीद बढ़ाने की योजना बना रहा है। ऊर्जा (कच्चा तेल, LNG, LPG),विमान और विमान के पार्ट्स तकनीकी उपकरण (GPU, डेटा-सेंटर उपकरण),कीमती धातुएँ और कोकिंग कोल इन क्षेत्रों में खरीद बढ़ाकर व्यापार तेजी से बढ़ाया जा सकता है।

टैरिफ (आयात शुल्क) कम करना : प्रस्तावित व्यापार समझौते में अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ लगभग 50% से घटाकर लगभग 18% तक ला सकता है। भारत भी अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क कम कर सकता है। इससे दोनों देशों के सामान सस्ते होंगे और व्यापार बढ़ेगा।

टेक्नोलॉजी और डिजिटल व्यापार: दोनों देश इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं: सेमीकंडक्टर और AI,डेटा सेंटर और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर,डिजिटल व्यापार नियम इससे हाई-टेक व्यापार में बड़ा विस्तार हो सकता है।

रक्षा और विमानन क्षेत्र:भारत पहले से अमेरिका से बड़े रक्षा और विमानन सौदे कर रहा है, जैसे: बोइंग विमान खरीद,रक्षा उपकरण,संयुक्त उत्पादन इन सौदों से व्यापार का बड़ा हिस्सा बढ़ सकता है।

ऊर्जा और सप्लाई-चेन सहयोग: भारत अमेरिका से अधिक तेल और गैस,स्वच्छ ऊर्जा तकनीक,महत्वपूर्ण खनिज खरीद सकता है, जिससे व्यापार का आकार बढ़ेगा। 2030 तक 500 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करने के लिए व्यापार समझौता,टैरिफ में कमी,ऊर्जा और रक्षा खरीद,टेक्नोलॉजी सहयोग,सप्लाई-चेन साझेदारी जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।





वाशिंगटन एजेंसी:अमेरिका:डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति से भारत के कौन-कौन से उद्योग (जैसे स्टील, आईटी, फार्मा) सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

वाशिंगटन एजेंसी:अमेरिका:डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ नीति से भारत के कौन-कौन से उद्योग (जैसे स्टील, आईटी, फार्मा) सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

टैरिफ लगने से टाटा स्टील को कितना बड़ा नुक्सान।

Donald Trump की टैरिफ (आयात शुल्क) नीति का असर India के कई उद्योगों पर पड़ा। कुछ सेक्टरों को नुकसान हुआ, जबकि कुछ को नए अवसर भी मिले। विशेषज्ञों के अनुसार सबसे अधिक प्रभाव इन उद्योगों पर देखा गया।

स्टील और एल्युमिनियम उद्योगअमेरिका ने स्टील और एल्युमिनियम आयात पर भारी टैरिफ लगाए। इससे भारतीय स्टील कंपनियों के निर्यात पर असर पड़ा,भारतीय स्टील उत्पाद अमेरिका में महंगे हो गए। इससे मांग कम हुई और निर्यात घटा। इसका असर भारतीय कंपनियों जैसे: Tata Steel, JSW Steel पर भी पड़ा।

आईटी उद्योग:-भारत का आईटी सेक्टर सीधे टैरिफ से कम लेकिन नीतिगत बदलावों से प्रभावित हुआ।अमेरिका में लोकल जॉब्स बढ़ाने की नीति पर जोर दिया गया। वीजा नियम सख्त हुए। इससे भारतीय आईटी कंपनियों की लागत बढ़ी।

प्रभावित कंपनिया:- इन्फोसिस,टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो।

फार्मास्यूटिकल उद्योग: भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का बड़ा निर्यातक है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा दवा बाजार है। टैरिफ और दवा कीमत नियंत्रण की चर्चा से कंपनियों पर दबाव बढ़ा। 

प्रभावित कंपनियां: सन फार्मास्युटिकल,रेड्डी लेबोरेट्री हालांकि इस सेक्टर को अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ क्योंकि अमेरिका को सस्ती दवाओं की जरूरत रहती है।

ऑटो पार्ट्स उद्योगभारतीय ऑटो कंपोनेंट कंपनिया अमेरिका को बड़ी मात्रा में निर्यात करती हैं। टैरिफ बढ़ने से इन उत्पादों की कीमत बढ़ गई। इससे प्रतिस्पर्धा कम हुई।

टेक्सटाइल और गारमेंट उद्योग: जब युनाइटेड स्टेट्स ने कुछ देशों पर टैरिफ बढ़ाए,तो कुछ ऑर्डर चीन से हटकर भारत की ओर आए। लेकिन प्रतिस्पर्धा वियतनाम और बांग्लादेश से भी रही।

निष्कर्ष:-Donald Trump की टैरिफ नीति से भारत के स्टील और ऑटो पार्ट्स उद्योग को सबसे ज्यादा सीधा असर हुआ। आईटी सेक्टर को वीज़ा और रोजगार नीति से दबाव झेलना पड़ा। फार्मा और टेक्सटाइल में मिश्रित असर देखने को मिला।





नई दिल्ली भारत-अमेरिका व्यापार में सबसे बड़ा खतरा क्या है 3 बड़े जोखिम कौन-कौन सी है।

नई दिल्ली: भारत-अमेरिका व्यापार में सबसे बड़ा खतरा क्या है 3 बड़े जोखिम कौन-कौन सी हैं।

भारत और अमेरिका व्यापार समझौते।
भारत–अमेरिका व्यापार (India-US Trade) तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसमें कुछ बड़े जोखिम भी हैं। नई दिल्ली के लिए 3 सबसे बड़े खतरे ये माने जा रहे हैं:-
टैरिफ और व्यापार विवाद (Tariff War Risk) अमेरिका अक्सर भारतीय सामान पर अतिरिक्त टैरिफ (import duty) लगा देता है। पहले भी अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर 25%–50% तक टैरिफ लगाए थे, जिससे एक्सपोर्ट में भारी गिरावट आई।
(१)टेक्सटाइल(२)जेम्स-ज्वेलरी(३)समुद्रीउत्पाद(४) चमड़ा उद्योग। अगर टैरिफ बढ़ते हैं तो भारत का अमेरिका को निर्यात कम हो सकता है। जांच, प्रतिबंध और नीति दबाव (US Investigations & Sanctions Risk) अमेरिका ने कई देशों के साथ भारत पर भी Section 301 जांच शुरू की है। आरोप होते हैं जैसे:(१)श्रम मानक (forced labour)(२)व्यापारिक नियम
(३)सब्सिडी या औद्योगिक नीति। अगर जांच में भारत के खिलाफ फैसला हुआ तो(१)ट्रेड सैंक्शन(२)नए टैरिफ(३)बाजार में प्रतिबंध लग सकते हैं।
भू-राजनीतिक और रणनीतिक टकराव (Geopolitical Risk) भारत कई देशों के साथ संतुलन बनाकर चलता है, जैसे:-(१)रुस से तेल और रक्षा सहयोग(२)China के साथ व्यापार प्रतिस्पर्धा(३) ब्रीस में भागीदारी।अगर अमेरिका को लगे कि भारत उसकी रणनीति के खिलाफ जा रहा है, तो: वह व्यापार दबाव:
(१)टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट कंट्रोल(२)वीज़ा या आईटी सेक्टर पर नियम लगा सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार के 3 बड़े जोखिम हैं:(१)टैरिफ और व्यापार युद्ध(२)अमेरिकी जांच व प्रतिबंध(३)भू-राजनीतिक टकराव।
भारत-अमेरिका व्यापार के 3 बड़े फायदे: निर्यात और विदेशी मुद्रा में वृद्धि ,टेक्नोलॉजी और विदेशी निवेश रोजगार के अवसर।निर्यात और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा।अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत अमेरिका को कई चीज़ें निर्यात करता है, जैसे: (१)आईटी सेवाएं(२)दवाइयां (फार्मा)(३)टेक्सटाइल(३)जेम्स  और  ज्वेलरी ?
इससे भारत को विदेशी मुद्रा (डॉलर) मिलती है और अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
टेक्नोलॉजी और निवेश:अमेरिकी कंपनियां भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करती हैं। उदाहरण:( गुगल  माइक्रोसॉफ्ट एप्पल) इससे भारत में नई टेक्नोलॉजी आती है। स्टार्टअप और उद्योग बढ़ते हैं।
डिजिटल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत होता है।रोजगार के अवसरभारत-अमेरिका व्यापार से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है, खासकर:आईटी सेक्टर,बीपीओ,फार्मा उद्योग,टेक्सटाइल उद्योग इससे युवाओं के लिए नौकरी और स्किल डेवलपमेंट के मौके बढ़ते हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार के 3 बड़े फायदे: निर्यात और विदेशी मुद्रा में वृद्धि,टेक्नोलॉजी और विदेशी निवेश,रोजगार के अवसर।

वाशिंगटन एजेंसी:अमेरिका:डोनाल्ड ट्रम्प की “टैरिफ नीति” से भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा।

वाशिंगटन एजेंसी:अमेरिका:डोनाल्ड ट्रम्प की “टैरिफ नीति” से भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा।

बड़े पैमाने पर निवेश करने वाले स्टीमर को समुद्री रास्ते।

वॉशिंगटन एजेंसी रिपोर्ट: Donald Trump की टैरिफ (आयात शुल्क) नीति का असर केवल United States तक सीमित नहीं रहा, बल्कि India सहित पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा। विशेषज्ञों के अनुसार इस नीति से व्यापार, उद्योग और बाजारों में कई बड़े बदलाव देखने को मिले।

दुनिया भर के बाजारों में उतार-चढ़ावटैरिफ घोषणाओं के बाद अक्सर शेयर बाजार गिर जाते थे। कंपनियों को सप्लाई चेन बदलनी पड़ी। निवेशकों में अस्थिरता बढ़ी। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उत्पादन चीन से अन्य देशों में शिफ्ट करना शुरू किया। भारत पर असर भारत पर इसके मिश्रित प्रभाव पड़े। नकारात्मक असर अमेरिका ने कुछ भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाए। भारत को दी जाने वाली  GPS व्यापार सुविधा समाप्त कर दी गई। इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हुआ। कुछ सकारात्मक असर महंगाई और उत्पादन लागत: 

टैरिफ का मतलब है आयातित सामान महंगा होना।अमेरिका में कई उद्योगों के लिए कच्चा माल महंगा हुआ।इससे कुछ वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं। वैश्विक सप्लाई चेन महंगी और जटिल हो गई। 

वैश्विक अर्थव्यवस्था की गति धीमीअंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों ने चेतावनी दी कि अगर बड़े देशों के बीच टैरिफ युद्ध बढ़ता है तो: वैश्विक व्यापार घट सकता है। निवेश कम हो सकता है।आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ सकती है चीन से उत्पादन हटने पर कुछ कंपनियों ने भारत, वियतनाम और अन्य एशियाई देशों में निवेश पर विचार किया। इससे भारत के लिए नए अवसर भी बने।

महंगाई और उत्पादन लागत : टैरिफ का मतलब है आयातित सामान महंगा होना। अमेरिका में कई उद्योगों के लिए कच्चा माल महंगा हुआ। इससे कुछ वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं। वैश्विक सप्लाई चेन महंगी और जटिल हो गई। वैश्विक अर्थव्यवस्था की गति धीमी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों ने चेतावनी दी कि अगर बड़े देशों के बीच टैरिफ युद्ध बढ़ता है तो: वैश्विक व्यापार घट सकता है निवेश कम हो सकता है

आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ सकती है : Donald Trump की टैरिफ नीति ने अमेरिका-चीन व्यापार तनाव बढ़ाया वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा की भारत सहित कई देशों के व्यापार को प्रभावित किया लेकिन साथ ही कुछ देशों के लिए नई औद्योगिक और निवेश संभावनाएं भी पैदा हुईं। 






वाशिंगटन: अमेरिकी निवेशको ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आखरी समय में पीछे क्यों हट जाते हैं।

वाशिंगटन: अमेरिकी निवेशको ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आखरी समय में पीछे क्यों हट जाते हैं।

अमेरिका के दस दिग्गज निवेशक में से एक हैं।

अमेरिका में कई निवेशक और विश्लेषक कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प जब बहुत सख्त आर्थिक या व्यापारिक फैसले (जैसे टैरिफ, प्रतिबंध) घोषित करते हैं, तो बाद में अक्सर आख़िरी समय में नरम पड़ जाते हैं। इसके पीछे कुछ मुख्य कारण बताए जाते हैं।

शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट का दबाव:जब ट्रम्प ने कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए, तो वैश्विक बाजार में तेज गिरावट और अस्थिरता आ गई। निवेशकों के अनुसार जब बाजार बहुत ज्यादा गिरने लगता है या बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ती है,तब प्रशासन अक्सर निर्णय नरम कर देता है। एक उदाहरण में ट्रम्प ने बड़े टैरिफ लागू करने के 24 घंटे के अंदर ही उन्हें अस्थायी रूप से कम कर दिया, जिसके बाद शेयर बाजार में तेज उछाल आया।

(Negotiation Strategy) (दबाव बनाकर सौदा करना) ट्रम्प की शैली यह मानी जाती है कि पहले बहुत कठोर घोषणा करते हैं ताकि दूसरे देश बातचीत की मेज पर आए । बाद में समझौते या बातचीत के लिए कुछ कदम पीछे ले लेते हैं। कई अधिकारी कहते हैं कि यह उनकी “डील-मेकिंग रणनीति” का हिस्सा है।

निवेशकों में एक धारणा बन गई है। वॉल स्ट्रीट में कुछ लोग इसे मज़ाक में "टैको"(Trump Always Chickens Out) भी कहते हैं। यानी डोनाल्ड ट्रम्प अक्सर अंतिम समय में फैसले से पीछे हट जाते हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान का डर बहुत सख्त टैरिफ या राजनीतिक तनाव से स्टॉक मार्केट गिर सकता है। महंगाई बढ़ सकती है। वैश्विक व्यापार युद्ध शुरू हो सकता है। इसलिए कई बार प्रशासन तनाव कम करने के लिए फैसला बदल देता है।

निवेशकों का मानना है कि ट्रम्प पहले कड़ा रुख अपनाते हैं ताकि दबाव बने, लेकिन जब बाजार या अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर दिखता है तो वे अक्सर पीछे हट जाते हैं या फैसले में बदलाव कर देते हैं।




तेहरान:अब्दान:विश्व की सबसे बड़ी और दूसरी रिफायनरी तेहरान अब्दान है।

तेहरान:अब्दान:विश्व की सबसे बड़ी और दूसरी रिफाइनरी तेहरान,अब्दान है।
भारत को खड़ी देशों पेट्रोल डीज़ल केरोसीन एलपीजी गैस निर्यात करने वाले स्टीमर।

तेहरान रिफाइनरी यह ईरान की राजधानी के पास स्थित है यहां पेट्रोल,डीज़ल, और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों का प्रसंस्करण होता है।
अब्दान रिफाइनरी यह ईरान की सबसे पुरानी रिफाइनरी और सबसे बड़ी रिफाइनरी है। जो ईरान के दक्षिण और पश्चिम हिस्से में स्थित है। इसका संचालन 1912 ई0 में हुई। और आज भी यह ईरान की पेट्रोलियम उत्पादों की बड़ी आपूर्तिकर्ता है।
इतिहास: उस समय ब्रिटीश हुकूमत ने अपने फायदे के लिए रिफाइनरी का निर्माण किया। मोहम्मद मोसाददेघ ने राष्ट्रीयकरण करवाया जिसके कारण बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया। आज भी ईरान की सबसे महत्वपूर्ण रिफाइनरी में से एक है।
इसने मध्य पूर्व के तेल व्यापार और वैश्विक उर्जा राजनीति पर बड़ा प्रभाव डाला। एक समय इस रिफाइनरी के कारण अबदान शहर विश्व के प्रमुख तेल औधोगिक शहरों में गिना जाता था।
अब्दान रिफाइनरी भारत से जुड़ा हुआ माना जाता है क्योंकि इसके निर्माण,संचालन में भारतीय श्रमिकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। 
ब्रिटिश भारत का आर्थिक संबंध: जब यह रिफाइनरी 1912 ई० में बनी थी उस समय ब्रिटीश हुकूमत के शासन के अधीन था। इसलिए इसका प्रबंधन और श्रमिक व्यवस्था ब्रिटिश भारत से जुड़ी थी।
भारतीय श्रमिकों और कर्मचारियों की संख्या : रिफाइनरी में काम करने वाले हजारों मजदूर ब्रिटिश शासन काल में भारतीय श्रमिक एवं कर्मचारियों के रूप कार्य करते थे। आज भी भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान से मजदूर ले जाया करते हैं। की लोग बिहार,बंगाल, उत्तर प्रदेश क्षेत्र से मजदूर थे।
भारतीय समुदाय: भारतीय समुदाय के लोगों का अब्दान रिफाइनरी के आसपास एक बहुत बड़ी बस्ती है। वहां पर भारतीय समुदाय के मंदिर सांस्कृतिक संस्थाएं भी बनें हैं। की भारतीय परिवार कई वर्षो से घर परिवार लेकर रह रहे हैं। 
भारत को तेल की आपूर्ति: रिफाइनरी से निकला पेट्रोलियम उत्पाद ब्रिटिश शासन काल में भारत और एशिया के कई हिस्सों में भेजा जाता था।
1951 ई० में जब राजनीति घटना घटी थी उस समय ब्रिटीश कर्मचारी के साथ भारतीय लोग भी भारत लौट आए। वर्तमान समय में भी ईरान और अमेरिका के साथ युद्ध जारी रहने के कारण अबदान शहर से भारतीय लोग भारत वापस आ रहे हैं।