भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 103 रन से रौंदा, अंडर-19 टीम ने सीरीज 2-0 से जीती।

भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 103 रन से रौंदा, अंडर-19 टीम ने सीरीज 2-0 से जीती।

राजकोट। भारतीय अंडर-19 टीम ने बल्लेबाजी और गेंदबाजी में शानदार प्रदर्शन करते हुए ऑस्ट्रेलिया अंडर-19 को दूसरे युवा वनडे में 103 रन से हरा दिया। इस जीत के साथ भारत ने तीन मैचों की सीरीज पर 2-0 से कब्जा कर लिया। सीरीज का तीसरा और अंतिम मुकाबला बुधवार को खेला जाएगा।
भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में सात विकेट पर 341 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया। भारत की पारी के नायक यशबर्धन चौहान रहे, जिन्होंने 100 गेंदों पर 122 रन की शानदार शतकीय पारी खेली। उनकी पारी में 15 चौके और दो छक्के शामिल रहे।
चौहान को वीके विनीत का शानदार साथ मिला। विनीत ने 92 गेंदों में 87 रन बनाए और दोनों ने तीसरे विकेट के लिए 132 रन की महत्वपूर्ण साझेदारी की। इससे पहले आर्यवीर सहवाग ने 47 रन और कुशाग्र ओझा ने 34 रन बनाकर टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचाया।
238 रन पर सिमटी ऑस्ट्रेलिया
341 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम भारतीय गेंदबाजों के सामने 41.1 ओवर में 238 रन पर ऑलआउट हो गई। कप्तान जैक चोस्नेक ने 81 रन बनाकर संघर्ष किया, जबकि ब्लेक कैटल ने 44 और मैथ्यू लॉघ ने 42 रन बनाए।
भारत की ओर से चिगुरुपति वेंकट ने 64 रन देकर तीन विकेट लिए। काव्या पटेल और यशबर्धन चौहान को दो-दो विकेट मिले। भारत ने ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को लगातार दबाव में रखा और नियमित अंतराल पर विकेट हासिल किए।
संक्षिप्त स्कोर:-
भारत अंडर-19: 341/7 (50 ओवर)
यशबर्धन चौहान 122, वीके विनीत 87, आर्यवीर सहवाग 47
ऑस्ट्रेलिया अंडर-19: 238/10 (41.1 ओवर)
जैक चोस्नेक 81, ब्लेक कैटल 44, मैथ्यू लॉघ 42
नतीजा: भारत 103 रन से विजयी।
सीरीज: भारत 2-0 से आगे और सीरीज अपने नाम।

वायु सेना की ताकत बढ़ाने की तैयारी, 60 नए लड़ाकू विमान शामिल होने की उम्मीद।

वायु सेना की ताकत बढ़ाने की तैयारी, 60 नए लड़ाकू विमान शामिल होने की उम्मीद।

भारतीय वायुसेना को मजबूत करने के लिए 60 नये लड़ाकू विमान बेड़े में शामिल होंगे।नई दिल्ली। भारतीय वायु सेना की लड़ाकू क्षमता को मजबूत करने की दिशा में नए लड़ाकू विमानों की तैनाती की तैयारी पर जोर दिया जा रहा है। प्रस्तावित योजना के तहत करीब 60 नए लड़ाकू विमानों को वायु सेना के बेड़े में शामिल किए जाने की संभावना है। इन विमानों के शामिल होने से वायु सेना की परिचालन क्षमता और विभिन्न मोर्चों पर तैनाती की क्षमता बढ़ सकती है।

रक्षा क्षेत्र में लगातार बदलती सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए लड़ाकू विमानों की संख्या और आधुनिक तकनीक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नए विमानों के शामिल होने से पुराने विमानों पर निर्भरता कम करने और लड़ाकू स्क्वाड्रनों की क्षमता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, विमानों की वास्तविक संख्या, खरीद प्रक्रिया, निर्माता, डिलीवरी की समयसीमा और तैनाती से संबंधित अंतिम जानकारी आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी नई खरीद का प्रभाव केवल विमानों की संख्या पर नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, हथियार प्रणाली, रखरखाव और आवश्यक बुनियादी ढांचे पर भी निर्भर करता है।

रेलवे कुलियों की ग्रुप-डी में समायोजन की मांग: पत्रों के बाद भी नहीं निकला समाधान, सांसदों की पहल पर उठे सवाल।

रेलवे कुलियों की ग्रुप-डी में समायोजन की मांग: पत्रों के बाद भी नहीं निकला समाधान, सांसदों की पहल पर उठे सवाल।

दो फरवरी को बजट पेश होगा लेकिन जबाब क्या मिलेगा।

पहले से रेलवे कुली  को जानकारी प्राप्त कर 

नई  है। दिल्ली। देशभर के रेलवे स्टेशनों पर वर्षों से यात्रियों का सामान उठाने का काम कर रहे लाइसेंसधारी रेलवे कुलियों को रेलवे में ग्रुप-डी के पदों पर समायोजित करने की मांग एक बार फिर चर्चा में है। विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के रेलवे कुलियों ने अपने-अपने स्थानीय सांसदों के माध्यम से प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को पत्र भेजकर अपनी मांग रखने की कोशिश की है। हालांकि, कुलियों का कहना है कि अब तक उन्हें इस पहल का कोई ठोस परिणाम नहीं मिला है।
कुलियों के अनुसार, उन्होंने सांसदों से आग्रह किया था कि उनकी मांग को संसद में प्रभावी ढंग से उठाया जाए और प्रधानमंत्री तथा रेल मंत्री के समक्ष समायोजन का मुद्दा मजबूती से रखा जाए। उनका दावा है कि कई सांसदों ने पत्राचार तो किया, लेकिन मामला संसद के स्तर पर प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ सका।
कुलियों का कहना है कि वे लंबे समय से रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की सेवा करते आ रहे हैं और कठिन परिस्थितियों में अपना रोजगार चला रहे हैं। उनका तर्क है कि उनकी सेवाओं और लंबे अनुभव को देखते हुए रेलवे में ग्रुप-डी के पदों पर समायोजन के लिए सरकार को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
अब देशभर के कुलियों की निगाहें प्रधानमंत्री, रेल मंत्रालय और संसद पर टिकी हैं। कुलियों का कहना है कि केवल पत्राचार से समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि सांसदों को इस मुद्दे को संसद में उठाकर सरकार से स्पष्ट जवाब मांगना चाहिए।
कुलियों ने मांग की है कि केंद्र सरकार उनके प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर उनकी मांग पर ठोस निर्णय लेने की दिशा में कदम उठाए।

रेलवे कुलियों की ग्रुप-डी में समायोजन की मांग: पत्रों के बाद भी नहीं निकला समाधान, सांसदों की पहल पर उठे सवाल।

रेलवे कुलियों की ग्रुप-डी में समायोजन की मांग: पत्रों के बाद भी नहीं निकला समाधान, सांसदों की पहल पर उठे सवाल।

श्रीमती स्मिता उदय बाघ सांसद को जलगांव महाराष्ट्र के रेलवे कुली ने ग्रुप डी में समायोजित करने के लिए पत्र दिया।

नई दिल्ली। देशभर के रेलवे स्टेशनों पर वर्षों से यात्रियों का सामान उठाकर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले रेलवे कुलियों की ग्रुप-डी में समायोजन की मांग एक बार फिर चर्चा में है। कुलियों का कहना है कि उन्होंने अपने-अपने क्षेत्र के सांसदों से प्रधानमंत्री और रेल मंत्री के नाम पत्र लिखवाकर अपनी मांग केंद्र सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।

कुलियों का कहना है कि सांसदों द्वारा पत्र भेजना पर्याप्त नहीं है। उनका मुद्दा संसद में उठाया जाना चाहिए और सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा जाना चाहिए। उनका आरोप है कि कई मामलों में सांसदों ने केवल पत्राचार तक सीमित पहल की, जिसके कारण उनकी मांग आगे नहीं बढ़ सकी।

 

कुलियों का बयान:-

रेलवे कुलियों का कहना है कि वे वर्षों से रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की सेवा कर रहे हैं। उनका कहना है कि बदलती रेलवे व्यवस्था, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और यात्रियों के सामान ढोने के काम में आए बदलावों के कारण उनकी आजीविका पर असर पड़ा है। कुलियों का कहना है कि सरकार उनके लंबे अनुभव और सेवाओं को देखते हुए ग्रुप-डी में समायोजन की नीति पर गंभीरता से विचार करे।

सांसदों से 5 सवाल:-

क्या सांसदों ने कुलियों की मांग को संसद में प्रश्न या शून्यकाल के माध्यम से उठाया?
क्या प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को भेजे गए पत्रों पर प्राप्त जवाब की जानकारी कुलियों को दी गई?
क्या सांसदों ने रेल मंत्रालय से कुलियों के प्रतिनिधिमंडल की बैठक कराने की मांग की?
क्या संबंधित संसदीय समितियों के सामने कुलियों की समस्या रखने का प्रयास किया गया?
क्या सांसद सरकार से ग्रुप-डी में समायोजन के लिए स्पष्ट नीति बनाने की मांग करेंगे?

सरकार से 5 सवाल:-

क्या सरकार रेलवे कुलियों की लंबे समय से चली आ रही ग्रुप-डी में समायोजन की मांग पर विचार कर रही है?
क्या कुलियों के अनुभव और वर्षों की सेवा को किसी प्रस्तावित नीति में महत्व दिया जाएगा?
क्या रेलवे कुलियों के प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक बैठक की जाएगी?
क्या सरकार इस मांग पर संसद में या रेल मंत्रालय के स्तर पर स्पष्ट जवाब देगी?
यदि ग्रुप-डी में समायोजन संभव नहीं है, तो कुलियों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार की वैकल्पिक नीति क्या है?

अब जवाब का इंतजार:-

कुलियों का कहना है कि वर्षों से पत्राचार और आश्वासनों के बावजूद उनकी मांग का समाधान नहीं हुआ है। उनका कहना है कि अब उन्हें केवल पत्र नहीं, बल्कि संसद में मुद्दा उठाए जाने और सरकार की ओर से स्पष्ट निर्णय की आवश्यकता है। ऐसे में आने वाले समय में सांसदों और रेल मंत्रालय की पहल इस मुद्दे की दिशा तय कर सकती है।

सांसद के पत्र के बावजूद समाधान नहीं, संसद की पहल पर टिकी उम्मीद।

सांसद के पत्र के बावजूद समाधान नहीं, संसद की पहल पर टिकी उम्मीद।

भारतीय रेलवे कुली समाचार पत्र देश-विदेश समाचार.

भारतीय रेलवे कुली का कहना है कि केवल पत्राचार से समस्या का स्थायी समाधान होता दिखाई नहीं दे रहा है। जब तक संसद में इस मुद्दे को प्रभावी ढंग से नहीं उठाया जाता और सरकार से स्पष्ट जवाब नहीं मांगा जाता, तब तक समाधान की उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आती।भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सांसद द्वारा प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को पत्र भेजे जाने के बावजूद संबंधित मुद्दे पर अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। पत्राचार और मांग उठाए जाने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं होने से लोगों में निराशा बनी हुई है।

स्थानीय कुलियों का कहना है कि केवल प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को पत्र भेजने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। उनका मानना है कि जब तक संसद में इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं उठाया जाएगा और संबंधित मंत्रालय से स्पष्ट जवाब नहीं मांगा जाएगा, तब तक समाधान की उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती।

अब निगाहें संसद की पहल पर टिकी हैं। रेलवे कुलियों की मांग है कि सांसद इस विषय को संसद में उठाएं, संबंधित मंत्रालय से कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट कराएं और समाधान के लिए समयबद्ध कदम सुनिश्चित कराने का प्रयास करें।

22 अगस्त 2003 का फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण.

22 अगस्त 2003 का फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण.

भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सांसद द्वारा प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को पत्र भेजे जाने के बावजूद संबंधित मुद्दे पर अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। पत्राचार और मांग उठाए जाने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं होने से लोगों में निराशा बनी हुई है।

स्थानीय रेलवे कुली का कहना है कि केवल प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को पत्र भेजने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। उनका मानना है कि जब तक संसद में इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं उठाया जाएगा और संबंधित मंत्रालय से स्पष्ट जवाब नहीं मांगा जाएगा, तब तक समाधान की उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती।

निगाहें संसद की पहल पर टिकी हैं। रेलवे कुलियों की मांग है कि सांसद इस विषय को संसद में उठाएं, संबंधित मंत्रालय से कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट कराएं और समाधान के लिए समयबद्ध कदम सुनिश्चित कराने का प्रयास करें।

इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कई पुराने आदेशों 15 अप्रैल 1991, 9 मई 1995, 8 जुलाई 1996 और 19 सितम्बर 1997 को एक साथ देखते हुए Parcel Porters के मामलों के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की।

मुख्य शर्तों में शामिल थीं:-
Assistant Labour Commissioner द्वारा प्रत्येक claimant के रिकॉर्ड की जाँच।
वास्तविक contract labour service की पुष्टि।
उपलब्ध perennial work के आधार पर absorption।
superannuation की आयु पूरी कर चुके व्यक्ति को absorption से बाहर रखना।
medical fitness आवश्यक होना।
लंबे समय तक काम करने वालों को अपेक्षाकृत प्राथमिकता देना।
absorption के बाद Railway के नियमित कर्मचारियों पर लागू सेवा शर्तों का पालन।
2004–2008 के बारे में महत्वपूर्ण निष्कर्ष
मेरी खोज में 2004 से 2008 के बीच 2003 के फैसले जैसा कोई नया, व्यापक सुप्रीम कोर्ट का मूल निर्णय नहीं मिला जिसने Railway Parcel Porters के नियमितीकरण के सिद्धांत को पूरी तरह बदल दिया हो। 2003 का फैसला बाद की कार्यवाही में मुख्य आधार बना रहा।
इसलिए यदि आपका उद्देश्य “1995 से 2008 तक सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे कुलियों/पोर्टरों के नियमितीकरण के बारे में क्या-क्या आदेश दिए” की कानूनी सूची तैयार करना है, तो ऊपर के 1995, 1996, 1997, 1998 और 2003 के आदेश सबसे महत्वपूर्ण हैं।
एक और महत्वपूर्ण सुधार: 1995 की मूल सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही का केस नंबर W.P.(C) No. 507/1992 with W.P. No. 415/1992, 82/1993 और 838/1992 है और निर्णय की तारीख 09.05.1995 है—इसे 1999 बताने वाले कुछ द्वितीयक स्रोतों में तारीख संबंधी गलती दिखाई देती है। 
अगर आप चाहें, मैं अगला चरण बनाकर इन सभी मामलों की पूरी “केस-वाइज कानूनी फाइल” दे सकता हूँ—हर केस में केस नंबर + तारीख + जजों की बेंच + रेलवे स्टेशन/जोन + कितने पोर्टर + सुप्रीम कोर्ट का exact operative direction + SCC/AIR citation + बाद में किस मामले में इस आदेश का पालन हुआ, ताकि इसे कोर्ट/RTI/रेलवे दावा के संदर्भ में इस्तेमाल करना.

Indian Railway Coolie Order27 अप्रैल 1998,W.P.(C) No. 176/1995.Railway Parcel Porters matter,

27 अप्रैल 1998,W.P.(C) No. 176/1995.Railway Parcel Porters matter,

Supreme court justices

सुप्रीम कोर्ट ने Labour Commissioner को संबंधित Parcel Porters के लगातार काम करने तथा काम के perennial nature की जाँच करने का निर्देश दिया। 2003 के फैसले में इस आदेश का विशेष उल्लेख है।

16 अक्टूबर 1998.W.P.(C) No. 90/1997.Railway Parcel & Goods Handling Mazdoor Union v. Union of India.

Labour Commissioner की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद कोर्ट ने ऐसे Porters/Workers के बारे में निर्देश दिए जो सहकारी समितियों के माध्यम से लगाए गए थे और 10 वर्ष या उससे अधिक समय से लगातार काम कर रहे थे। पात्र पाए जाने पर medical fitness और superannuation की शर्तों के अधीन regularisation/absorption का निर्देश दिया गया। 

08 सितम्बर 2000/W.P.(C) No. 433/1998 में अंतरिम आदेश.A.I. Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India.

लंबित मामले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रूप से कहा कि विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर Parcel Porters का regularisation न किया जाए, चाहे किसी अन्य कोर्ट/Tribunal/authority का आदेश क्यों न हो।

22 अगस्त 2003

W.P.(C) No. 433/1998 + W.P.(C) Nos. 457/1998, 278/1999, 530/2000, 599/2000, 45/2001, 121/2000, 262/2002, 19/2003; C.A. No.57/2001; SLP(C) No.6560/2001.
A.I. Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India.यह 1995–2008 अवधि का सबसे विस्तृत निर्णय है। Court ने Assistant Labour Commissioner, Lucknow को प्रत्येक claimant की genuineness की जाँच करने और पात्र पाए जाने वाले Parcel Porters को उपलब्ध perennial work के आधार पर permanent absorption के लिए विचार करने के निर्देश दिए।




सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंसधारी रेलवे पोर्टरों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंसधारी रेलवे पोर्टरों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। 

Supreme Court Justice

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे प्रशासन उनके काम, समय, दरों, वर्दी और अनुशासन को नियंत्रित करता है तथा उन्हें रेलवे की ओर से सुविधाएँ भी मिलती हैं। इस आधार पर उन्हें रेलवे की सेवा से जुड़े “workmen” माना गया।

22 अगस्त 2003 — All India Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India

यह पार्सल पोर्टरों/कॉन्ट्रैक्ट पोर्टरों के नियमितीकरण से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला था। बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सार इस प्रकार दर्ज है:

पहले यह जांच हो कि दावा करने वाले पोर्टर वास्तव में संबंधित रेलवे स्टेशनों पर काम करते थे।

पात्र पाए जाने पर रेलवे को उन्हें स्थायी रूप से absorb/regularise करना था।

नियमितीकरण उपलब्ध perennial (निरंतर) काम की मात्रा तक सीमित होना था।

नियमित रेलवे पार्सल पोर्टरों के समान न्यूनतम वेतनमान और सेवा लाभ मिलने थे।

अधिक लंबे समय तक काम कर चुके पोर्टरों को प्राथमिकता दी जानी थी।

महत्वपूर्ण अंतर: 1979 का मामला मुख्यतः licensed passenger porters की कानूनी स्थिति से जुड़ा था, जबकि 2003 का फैसला विशेष रूप से contract railway parcel porters के absorption/regularisation से संबंधित था। इसलिए हर रेलवे कुली पर 2003 का आदेश स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।

1995 से 2008 तक सुप्रीम कोर्ट के रेलवे कुली/पोर्टर संबंधी सभी प्रमुख आदेश तारीख और केस नंबर सहित क्रमवार निकाल कर दे रहा हूं।

 1995–2008 : प्रमुख सुप्रीम कोर्ट आदेश/निर्णय।

क्रम संख्या (1) 09 मई 1995 W.P(C) No.507/1992 With W.P No.415/1992,82/1993&838/1992, National Federation of Railway Porters, Vendor & Bearers Vs Union of india.

रेलवे में ठेके के माध्यम से लंबे समय से काम कर रहे Parcel Porters के नियमितीकरण/स्थायी अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण आदेश। कोर्ट ने जाँच रिपोर्ट के आधार पर पात्र पोर्टरों को उपलब्ध स्थायी/परिनियल काम के अनुपात में नियमित रूप से absorb करने के निर्देश दिए।

(2) 08 जुलाई 1996 W.P.(C) Nos. 568/1995 & 711/1995.National Federation of Railway Porters' Union matters.1995 के निर्णय के बाद फिर से Parcel Porters के नियमितीकरण/अवशोषण के संबंध में निर्देश दिए गए। बाद के 2003 के सुप्रीम कोर्ट निर्णय ने इन दोनों मामलों को स्पष्ट रूप से precedent के रूप में दर्ज किया है।

(3)19 सितम्बर 1997 W.P.(C) No. 90/1997.Railway Parcel Porters matter.सुप्रीम कोर्ट ने Assistant Labour Commissioner, Calcutta को जाँच करने का निर्देश दिया कि संबंधित पोर्टर लगातार काम कर रहे थे या नहीं, काम perennial nature का था या नहीं और Contract Labour (Regulation & Abolition) Act की धारा 10 की शर्तें पूरी होती थीं या नहीं।

(4) 01 अक्टूबर 1997

Civil Appeal No. 6953/1997, arising from SLP(C) No. 19434/1996.Rashtriya Chaturth Shreni Railway Majdoor Congress (INTUC) v. Union of India.

Agra Fort Railway Station के Parcel Porters का मामला। सुप्रीम कोर्ट ने CAT का आदेश रद्द कर Tribunal को निर्देश दिया कि वह 1995 के National Federation फैसले के सिद्धांतों के आधार पर मामले का merits पर निर्णय करे।





CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल।

एनडीए सरकार पर व्यंग्य: मंत्री मालामाल, ठेकेदार मालामाल, जनता बेहाल!

CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल क्यों।

CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल।
नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों एक नया व्यंग्य खूब सुनाई दे रहा है—“सरकार की योजनाएं बढ़ीं, ठेकों का आकार बढ़ा, लेकिन आम आदमी की जेब का आकार वही रहा।” विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों का तंज है कि एनडीए सरकार के दौर में विकास की रफ्तार का फायदा सबसे पहले मंत्रियों और बड़े ठेकेदारों तक पहुंचता दिखाई देता है, जबकि आम जनता महंगाई, रोजगार और रोजमर्रा के खर्चों के बीच जूझ रही है।
सरकार की ओर से लगातार सड़क, रेलवे, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाने की बात कही जाती है। दूसरी ओर, CAG की विभिन्न रिपोर्टों में सरकारी परियोजनाओं और खर्चों में प्रक्रियागत कमियों तथा अनुपालन से जुड़ी टिप्पणियां भी सामने आती रही हैं।
इसी को लेकर राजनीतिक व्यंग्य में कहा जा रहा है—“ठेकेदार की फाइल दौड़ती है, भुगतान की गाड़ी दौड़ती है, लेकिन जनता की गाड़ी पेट्रोल-डीजल और महंगाई में अटक जाती है।”
हालांकि, “मंत्री मालामाल” या “ठेकेदार मालामाल” जैसे आरोपों को व्यापक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए प्रत्येक मामले में ठोस दस्तावेज और स्वतंत्र जांच जरूरी होगी। इतना जरूर है कि सरकारी खर्च में पारदर्शिता, ठेकों की निगरानी और योजनाओं का वास्तविक लाभ आम लोगों तक पहुंचना लगातार सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।
विकास की गाड़ी आखिर किसके दरवाजे तक पहुंच रही है और आम जनता उसके टिकट का किराया क्यों चुका रही है?


GST को लेकर विपक्ष का तीखा तंज, ‘मोदी का वश चले तो शौचालय जाने पर भी 18% टैक्स लगा दें।

GST को लेकर विपक्ष का तीखा तंज, ‘मोदी का वश चले तो शौचालय जाने पर भी 18% टैक्स लगा दें।

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में 100 में 100% समानों में 18% जीएसटी लगाया गया, रेलवे स्टेशनों पर शौचालय करने पर भी 18% जीएसटी यात्रियों को देना पर रहा है। फिर भी सरकार कह रही है कि मैं देश का विकास कर रहा हूं।

नई दिल्ली। GST को लेकर राजनीतिक बहस के बीच विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं ने सरकार की कर व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा कि “अगर मोदी का वश चले तो शौचालय करने पर भी 18 प्रतिशत GST लागू कर दें।”

विपक्ष का आरोप है कि सरकार की कर नीतियों का असर आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ रहा है। इसी मुद्दे को लेकर विपक्षी नेताओं ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि आने वाले समय में लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी टैक्स चुकाना पड़ सकता है।

हालांकि, शौचालय के उपयोग पर 18 प्रतिशत GST लगाए जाने का कोई सरकारी प्रस्ताव सामने नहीं आया है। इसलिए यह बयान राजनीतिक व्यंग्य और सरकार की कर नीति पर कटाक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी वास्तविक GST निर्णय के रूप में।

GST की विभिन्न दरों को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस लगातार जारी रहती है। विपक्ष जहां महंगाई और कर बोझ को मुद्दा बना रहा है, वहीं सरकार GST व्यवस्था में सुधार और कर अनुपालन को लेकर अपने पक्ष पर जोर देती रही है।