कोलकाता: नरेंद्र मोदी जैसे राष्ट्रीय नेता रैलियों के लिए आते हैं, तो खर्च कई स्तरों पर होता है। यह खर्च सीधे “जनता की जेब से” होता है।

नरेंद्र मोदी जैसे राष्ट्रीय नेता रैलियों के लिए आते हैं, तो खर्च कई स्तरों पर होता है। यह खर्च सीधे “जनता की जेब से” होता है।
भारत के सबसे पहले प्रधानमंत्री है जो जनता के जेब से पैसे खर्च चुनावी रैली में हजारों करोड़ो रुपए खर्च करते हैं।
ट्रैफिक मैनेजमेंट, बैरिकेडिंग, ड्रोन निगरानी हेलीपैड, मंच के आसपास सुरक्षा व्यवस्था। ये सब खर्च राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बजट से आते हैं, यानी टैक्स के पैसे से अप्रत्यक्ष रूप से जनता का पैसा। खासकर (Kolkata): कोलकाता: पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान जब नरेंद्र मोदी जैसे राष्ट्रीय नेता रैलियों के लिए आते हैं, तो खर्च कई स्तरों पर होता है। यह खर्च सीधे “जनता की जेब से” और राजनीतिक दल दोनों के जरिए अलग-अलग रूप में आता है।

1. सुरक्षा और प्रशासनिक खर्च (सरकारी खर्च): प्रधानमंत्री की यात्रा होने के कारण भारी पुलिस बल, केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ (SPG आदि) तैनात होती हैं। ट्रैफिक मैनेजमेंट, बैरिकेडिंग, ड्रोन निगरानी हेलीपैड, मंच के आसपास सुरक्षा व्यवस्था। ये सब खर्च राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बजट से आते हैं, यानी टैक्स के पैसे से अप्रत्यक्ष रूप से जनता का पैसा।

2.यात्रा और लॉजिस्टिक्स,विमान,हेलीकॉप्टर,काफिला अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों की मूवमेंट प्रधानमंत्री की आधिकारिक यात्रा का खर्च सरकारी होता है, लेकिन पार्टी कार्यक्रम से जुड़े कुछ हिस्से पार्टी वहन करती है।

3. रैली और प्रचार का खर्च (पार्टी खर्च) यह हिस्सा मुख्य रूप से पार्टी (जैसे Bharatiya Janata Party) उठाती है। बड़े मंच, साउंड सिस्टम, LED स्क्रीन भीड़ जुटाने के लिए बस/ट्रांसपोर्ट,पोस्टर, बैनर,सोशल मीडिया प्रचार स्थानीय कार्यकर्ताओं का प्रबंध यह पैसा पार्टी फंड, चंदे और चुनावी फंडिंग से आता है।

4. अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव:- रैली के दिन सड़कों के बंद होने से व्यापार प्रभावित सरकारी मशीनरी चुनाव ड्यूटी में लगने से अन्य काम धीमे यह “छिपा हुआ खर्च” है, जो सीधे नहीं दिखता लेकिन आम लोगों पर असर डालता है।

कुल मिलाकर: सरकारी खर्च (टैक्स से): सुरक्षा, प्रशासन, आधिकारिक यात्रा पार्टी खर्च: रैली, प्रचार, भीड़ प्रबंधन अप्रत्यक्ष खर्च: जनता की दैनिक गतिविधियों पर असर इसलिए जब बड़ी रैलियाँ होती हैं, तो करोड़ों रुपये का कुल खर्च होना असामान्य नहीं है लेकिन यह पूरा पैसा एक ही स्रोत से नहीं आता, बल्कि कई चैनलों से मिलकर बनता है।

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