चैत्र नवरात्रि के पाँचवें दिन, यानी शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है।
स्कंदमाता का स्वरूप निराला
यह दिन विशेष रूप से शुद्ध मन, भक्ति और मानसिक साधना (मन में ध्यान करके पूजा) के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

स्कंदमाता का स्वरूप निराला
स्कंदमाता का स्वरूप और महत्व: मां स्कंदमाता, भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इसलिए इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है।
चार भुजाओं में कमल और बाल स्कंद को गोद में धारण करती हैं। इनकी पूजा से भक्त को सुख, शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मानसिक पूजा (मानसिक आराधना) का विधान अगर आप बाहरी सामग्री के बिना मन में पूजा करना चाहते हैं, तो यह विधि अपनाई जाती है।
ध्यान (Meditation) शांत स्थान पर बैठकर मां स्कंदमाता का ध्यान करें। उनके दिव्य स्वरूप को मन में स्पष्ट रूप से देखें।
मन ही मन प्रार्थना करें:-“हे मां स्कंदमाता, कृपा करके मेरे मन में विराजमान हों।”अर्चना (मानसिक पूजन) मन में ही फूल, अक्षत, चंदन, धूप, दीप अर्पित करें।
कल्पना करें कि आप पूरी श्रद्धा से मां की सेवा कर रहे हैं।
मंत्र जप:-“ॐ देवी स्कंदमातायै नमः” का जाप करें। जितना संभव हो, श्रद्धा से जप करें। भोग अर्पण (मानसिक रूप से)
मां को केले या मीठे का भोग मानसिक रूप से अर्पित करें।
अंत में मां की आरती मन ही मन गाएं और कृतज्ञता व्यक्त करें।
आध्यात्मिक लाभ:मन की शुद्धि और एकाग्रता बढ़ती है भय और तनाव कम होता है
जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन आता है।इस दिन की साधना का मुख्य उद्देश्य है। मन को निर्मल बनाकर मां के प्रति पूर्ण समर्पण करना। मन को निर्मल बनाकर मां के प्रति पूर्ण समर्पण करना।“मन को निर्मल बनाकर मां के प्रति पूर्ण समर्पण करना”यह नवरात्रि साधना का सबसे गहरा और सच्चा भाव है, विशेषकर मां स्कंदमाता की उपासना में। इसका वास्तविक अर्थ क्या है?
अपने भीतर से द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार को हटाना सरलता, करुणा और सच्चाई को अपनान हर विचार को शुद्ध और सकारात्मक बनाना।
पूर्ण समर्पण (Complete Surrender) यह भाव रखना कि “मैं नहीं, सब कुछ मां ही हैं” अपने कर्म, विचार और परिणाम सब मां को अर्पित कर देना। सुख-दुख, लाभ-हानि हर परिस्थिति को मां की इच्छा मानकर स्वीकार करना।
श्रद्धा से ध्यान करें: मां स्कंदमाता के स्वरूप को मन में धारण करें
अहंकार छोड़ें: “मैं” की भावना कम करें, “मां” की भावना बढ़ाएं
निस्वार्थ भाव रखें: पूजा किसी इच्छा के लिए नहीं, बल्कि प्रेम से करें
कृतज्ञता अपनाएं: जो भी मिला है, उसे मां का प्रसाद मानें।
एक सरल भाव: “हे मां, मेरा मन, बुद्धि और आत्मा—सब कुछ आपको समर्पित है। मुझे सही मार्ग दिखाएं और अपनी शरण में रखें”जब मन पूरी तरह शांत, सरल और समर्पित हो जाता है, तब सच्ची भक्ति अपने आप प्रकट होती है। यही स्थिति भक्ति का सर्वोच्च रूप मानी जाती है।
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