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नई दिल्ली, 30 मई। देश में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों को लेकर आम लोगों में नाराज़गी बढ़ती जा रही है।  |
Petrol and Diesel |
संपादकीय अमन कुमार मिश्र। नई दिल्ली 30 मई 2026।
कच्चा तेल सस्ता, फिर भी महंगा पेट्रोल-डीजल: जनता पूछ रही है सवाल।
जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है"यदि कच्चा तेल सस्ता हो रहा है, तो पेट्रोल और डीज़ल में राहत कब मिलेगी?" जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब तक ईंधन की कीमतें आम आदमी की चिंता का विषय बनी रहेंगी। |
| पेट्रोल और डीजल कीमतों में बढ़ोतरी एक बार क्यों नहीं। |
उपभोक्ताओं का कहना है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो पेट्रोल-डीज़ल के दाम तुरंत बढ़ा दिए जाते हैं, लेकिन जब कच्चा तेल सस्ता होता है तो राहत उतनी तेजी से नहीं मिलती।
हाल के दिनों में ईंधन कीमतों में कई चरणों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा है।
विशेषज्ञों के अनुसार पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें केवल कच्चे तेल के दाम से तय नहीं होतीं।
इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के कर, परिवहन लागत, रिफाइनिंग खर्च तथा तेल विपणन कंपनियों की लागत भी शामिल होती है।
यही कारण है कि कच्चे तेल में गिरावट का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाता।
दिलचस्प बात यह है कि हाल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, लेकिन कई शहरों में पेट्रोल-डीज़ल के खुदरा दाम ऊंचे स्तर पर बने रहे।
इससे उपभोक्ताओं के बीच यह धारणा मजबूत हुई है कि महंगाई का असर तुरंत दिखता है, जबकि राहत मिलने में देरी होती है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि सरकार को ईंधन मूल्य निर्धारण में अधिक पारदर्शिता लानी चाहिए ताकि जनता को यह स्पष्ट हो सके कि कीमतों में बदलाव के पीछे कौन-कौन से कारक जिम्मेदार हैं।
दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि ईंधन पर कर से प्राप्त राजस्व विकास कार्यों और जनकल्याण योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
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