कानून का सम्मान सर्वोपरि, सजा का फैसला केवल न्यायालय करेगा।
बेगूसराय/पटना। किसी भी चर्चित मामले में जनता की भावनाएं और प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक होती हैं, लेकिन भारतीय कानून व्यवस्था के अनुसार किसी व्यक्ति को फांसी, आजीवन कारावास या अन्य किसी दंड का निर्णय केवल सक्षम न्यायालय ही दे सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई, आरोप या प्राथमिकी दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं माना जाता।
संविधान और न्यायिक व्यवस्था के तहत प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। किसी भी मामले में जांच, साक्ष्य, गवाहों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर अदालत अंतिम फैसला सुनाती है। दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार सजा दी जाती है, जबकि आरोप सिद्ध नहीं होने पर संबंधित व्यक्ति को राहत मिलती है।
विधि विशेषज्ञों के अनुसार न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि अदालत के अंतिम निर्णय से पहले किसी भी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी आरोपी को फांसी या अन्य कठोर दंड देने की मांग पर अंतिम निर्णय न्यायालय और कानून के दायरे में ही लिया जाता है।
प्रशासनिक और कानूनी मामलों में पारदर्शिता तथा त्वरित न्याय की मांग करते हुए नागरिकों ने कहा कि सभी मामलों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि दोषी को सजा और निर्दोष को न्याय मिल सके। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन को लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला माना जाता है।
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