नई दिल्ली। सोमवार।"चाय, झाल मुड़ी और कुली” : प्रतीकात्मक राजनीति, लेकिन ज़मीनी समाधान अब भी अधूरा।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी झाल मुड़ी खाते हुए। सियासी सतरंज का खेल खेलना कोई इनसे सीखें।

"चाय, झाल मुड़ी और कुली” : प्रतीकात्मक राजनीति, लेकिन ज़मीनी समाधान अब भी अधूरा।

संवाददाता  अमन कुमार मिश्र रिपोर्ट:

नई दिल्ली, सोमवार  प्रधानमंत्री Narendra Modi की आम लोगों से जुड़ने वाली सार्वजनिक छवियाँ एक बार फिर चर्चा में हैं। 

कभी चाय बनाते हुए, कभी झालमुड़ी विक्रेताओं से बातचीत करते हुए और कभी रेलवे कुलियों से मुलाकात के दौरान दिखाई देने वाली उनकी तस्वीरें राजनीतिक बहस का केंद्र बनी हुई हैं।

विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह “प्रतीकात्मक राजनीति” तो है, लेकिन इससे जमीनी स्तर पर समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। 

आलोचकों का आरोप है कि रेलवे कुलियों जैसे वर्गों की वास्तविक समस्याएँ आय की कमी, अस्थिर रोजगार और सामाजिक सुरक्षा अब भी बनी हुई हैं।

रेलवे कुलियों का कहना है कि आधुनिक रेलवे व्यवस्था और डिजिटल सेवाओं के बढ़ने से उनका काम लगातार कम होता जा रहा है। कई कुलियों का यह भी आरोप है कि उनकी समस्याओं पर गंभीर और नियमित संवाद की कमी है, और उन्हें केवल अवसर विशेष पर ही याद किया जाता है।

Indian Railways की ओर से समय-समय पर यह दावा किया जाता है कि असंगठित कामगारों के लिए कई योजनाएँ लागू की गई हैं, जैसे पहचान पत्र, बीमा सुविधा और कुछ स्टेशनों पर वैकल्पिक रोजगार के अवसर।

हालांकि ज़मीनी स्तर पर कई कुलियों का कहना है कि इन योजनाओं का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँचता, और उनकी आय में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस अब केवल प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह इस सवाल पर केंद्रित हो गई है कि क्या जनसंपर्क कार्यक्रम वास्तव में नीतिगत सुधारों में बदल पा रहे हैं या नहीं।


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