नई दिल्ली, एजेंसी। अंतरराष्ट्रीय बाजार और डॉलर की चाल से तय हो रहा सोना।
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| ।घरेलू नीतियों का असर सीमित, वैश्विक तनाव से बढ़ी चमक। |
नई दिल्ली। देश में सोने की कीमतें लगातार नए रिकॉर्ड बना रही हैं। आम लोगों के लिए शादी-ब्याह और निवेश दोनों महंगे होते जा रहे हैं।
हालांकि बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सोने की बढ़ती कीमतों के पीछे सिर्फ घरेलू राजनीति या किसी एक सरकार की भूमिका नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार और मुद्रा विनिमय की बड़ी भूमिका है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में सोने की कीमत बढ़ते ही उसका सीधा असर भारतीय बाजार पर दिखाई देता है। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी भी सोने को और महंगा बना देती है।
हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, वैश्विक मंदी की आशंका और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की सुरक्षित निवेश की तलाश ने सोने की मांग बढ़ाई है।
जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोने में निवेश करते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आती है।
बाजार जानकारों का कहना है कि केंद्र सरकार की आयात शुल्क और टैक्स नीति का भी कुछ असर पड़ता है, लेकिन
यह असर सीमित होता है।
यदि आयात शुल्क बढ़ता है तो घरेलू कीमतें ऊपर जाती हैं, जबकि शुल्क घटने पर कुछ राहत मिल सकती है। बावजूद इसके, असली दिशा अंतरराष्ट्रीय बाजार ही तय करता है।
ज्वेलरी कारोबारियों के मुताबिक, भारतीय बाजार में शादी और त्योहारों के मौसम में मांग बढ़ने से भी कीमतों को सहारा मिलता है।
निवेश के रूप में सोने की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, जिसके कारण मांग मजबूत बनी हुई है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब तक वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता बनी रहेगी और डॉलर मजबूत रहेगा, तब तक सोने की कीमतों में नरमी की संभावना कम दिखाई देती है।
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