हनोई:वियतनाम के राष्ट्रपति ने कहा हनोई की मुक्ति के चंद हफ्तों बाद पहले व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने वियतनाम की यात्रा की।

वियतनाम के राष्ट्रपति ने जवाहर लाल नेहरू का जिक्र करते हुए कहा हनोई मुक्ति के चंद हफ्ते बाद पहले व्यक्ति हैं जो वियतनाम की यात्रा पर आए।
हनोई: वियतनाम के राष्ट्रपति ने कहा हनोई की मुक्ति के चंद हफ्तों बाद पहले व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने वियतनाम की यात्रा की।

हनोई मुक्ति के बाद चाचा नेहरू पहले व्यक्ति थे जिन्होंने वियतनाम की यात्रा की, आज भी वियतनाम के राष्ट्रपति एवं हनोई की जनता याद करते हैं।
यह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण तथ्य माना जाता है।

हनोई:-वियतनाम विभाजन के दौर से गुजर रहा था।

जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में हनोई की यात्रा की थी, जब वियतनाम फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के दौर से गुजर रहा था।

वियतनाम के राष्ट्रपति अक्सर इस यात्रा का उल्लेख भारत-वियतनाम मित्रता के शुरुआती प्रतीक के रूप में करते हैं। उस समय नेहरू एशियाई देशों की स्वतंत्रता और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के समर्थक नेताओं में गिने जाते थे वियतनाम एशिया महाद्वीप में स्थित एक देश है। 

यह दक्षिण-पूर्व एशिया में आता है। इसके चारों ओर ये देश और समुद्र हैं। उत्तर में: चीन,पश्चिम में: लाओस और कंबोडिया, पूर्व और दक्षिण में: दक्षिण चीन सागर।वियतनाम की राजधानी हनोई है।

यह यात्रा कई कारणों से महत्वपूर्ण मानी जाती है:

1954 में First Indochina War समाप्त हुई थी। उसी वर्ष हुए Geneva Conference of 1954 के बाद वियतनाम अस्थायी रूप से उत्तर और दक्षिण वियतनाम में विभाजित हुआ।

हनोई उस समय Viet Minh और बाद में उत्तर Vietnam की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया था।

विशेष रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, Ho Chi Minh के नेतृत्व में Viet Minh ने फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष तेज किया। 1945 में हनोई में ही स्वतंत्रता की घोषणा की गई और यही शहर उत्तर वियतनाम की राजधानी बना।

इसके बाद वियतनाम युद्ध (War) के दौरान भी हनोई उत्तर वियतनाम की सरकार, सैन्य रणनीति और साम्यवादी आंदोलन का मुख्य राजनीतिक केंद्र रहा।

हनोई उस समय Viet Minh और उत्तर वियतनाम की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका था।

नेहरू की यात्रा का उद्देश्य नव स्वतंत्र एशियाई देशों के बीच एकजुटता दिखाना और उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों के प्रति समर्थन प्रकट करना था। इस दौरान उनकी मुलाकात Ho Chi Minh से भी हुई थी।

भारत ने उस समय अपेक्षाकृत संतुलित नीति अपनाई थी और वह शीत युद्ध की राजनीति से अलग रहकर एशियाई सहयोग तथा गुटनिरपेक्षता को बढ़ावा दे रहा था

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