नई दिल्ली।भारत सरकार बिजनेसमैन के नियंत्रण में ।
भारत के रूपए की मुल्य घटा डॉलर के मुकाबले।
पिछले 5 साल में महंगाई की चुनौती: सरकार की नीतियों का असर कितना हुआ?

भारत के रूपए की मुल्य घटा डॉलर के मुकाबले।
भारत सरकार को महंगाई पर पूरी तरह काबू पाना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसके कई कारण बाहरी हैं। केंद्र सरकार ने कुछ उपाय किए हैं, लेकिन तेल और खाद्य मूल्यों जैसी वैश्विक परिस्थितियां कीमतों को प्रभावित करती हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार “पूरी तरह सक्षम नहीं है” आंशिक रूप से सही है, लेकिन यह भी ध्यान देना जरूरी है कि कुछ कारण सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं।
भारत में महंगाई पिछले पांच वर्षों में लगातार अर्थव्यवस्था की निगाहों में रही है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (C P I) और थोक मूल्य सूचकांक (W P I) के आंकड़ों से पता चलता है कि खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने आम जनता की जेब पर सीधा असर डाला है।
5 साल का महंगाई ट्रेंड (C P I औसत)
वर्ष। औसत C P I (%)। मुख्य कारण:
2021 5.1% कोविड-19 महामारी से उबरने के दौरान आपूर्ति में कमी।
2022 6.0% तेल की कीमतों में बढ़ोतरी वैश्विक आपूर्ति बाधाएं।
2023 5.8% खाध पदार्थों की अस्थिर कीमतें, पैदावार में गिरावट।
2024 5.2% सरकार ने सब्सिडी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली बढ़ाई, कीमतों पर कुछ काबू।
2025 5.5% वैश्विक कच्चे तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी, घरेलू कृषि उत्पादों की किरणों में उछाल।
सरकार की नीति : पेट्रोल-डीज़ल पर करों में कटौती, खाद्य सब्सिडी, और स्टॉक प्रबंधन ने महंगाई को पूरी तरह रोकने में मदद नहीं की, लेकिन बढ़ोतरी की रफ्तार को सीमित किया।
बाहरी दबाव: अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं ने घरेलू महंगाई को प्रभावित किया।
जनता पर असर: रोज़मर्रा की वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से आम नागरिक की खर्च क्षमता पर दबाव बना रहा।
अर्थशास्त्री मानते हैं कि सरकार ने नियंत्रण उपाय किए, लेकिन महंगाई पर पूर्ण नियंत्रण तब संभव होगा जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें स्थिर हों और कृषि उत्पादन में स्थायित्व आए।
पिछले 5 वर्षों में महंगाई बढ़ी है, लेकिन सरकार ने उसकी रफ्तार को सीमित करने के लिए विभिन्न कदम उठाए। हालांकि, वैश्विक परिस्थितियों ने यह साबित कर दिया कि महंगाई पर पूरी तरह नियंत्रण रखना आसान काम नहीं है।
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