नई दिल्ली:भारतीय नेताओं का रुख अक्सर सिद्धांत से ज्यादा परिस्थितियों (शक्ति,गठबंधन,वोटर) पर निर्भर करता है।

नई दिल्ली: भारतीय नेताओं का रुख अक्सर सिद्धांत से ज्यादा परिस्थितियों (शक्ति,गठबंधन,वोटर) पर निर्भर करता है।

नरेन्द्र मोदी की नीतियों में भी समय के साथ व्यावहारिक बदलाव दिखे हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के जज ने कहा था कि अक्सर चुनाव के समय में ही नयी योजना को पार्लियामेंट(संसद भवन) में रखा जाता है ऐसा क्यों वर्ष में एक बार बजट पेश किया जाता है बजट के समय में प्रस्ताव पारित क्यों नहीं किया जाता है।

राजनीति में आदर्श ज़रूर मौजूद होते हैं, लेकिन ज़मीन पर फैसले अक्सर परिस्थितियों सत्ता, गठबंधन, चुनावी गणित से प्रभावित होते हैं।


उदाहरण के तौर पर, नरेन्द्र मोदी की नीतियों में भी समय के साथ व्यावहारिक बदलाव दिखे हैं,कभी आर्थिक उदारीकरण पर ज़ोर, तो कभी कल्याणकारी योजनाओं पर। इसी तरह राहुल गांधी भी अलग-अलग मुद्दों पर अपने रुख को चुनावी और सामाजिक संदर्भ के अनुसार ढालते दिखते हैं।

यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। Winston Churchill जैसे नेता ने भी युद्ध के समय अपने फैसलों को आदर्श से ज्यादा तत्काल जरूरतों के हिसाब से बदला था।

असल में राजनीति को अक्सर “art of the possible” कहा जाता है,यानी जो संभव है, उसी के भीतर रहकर निर्णय लेना। इसमें तीन चीजें लगातार खींचतान करती हैं।

सिद्धांत– दीर्घकालिक दृष्टि और पहचान सत्ता सरकार चलाने की क्षमता जनसमर्थन चुनाव जीतने की मजबूरी।

कभी-कभी नेता सिद्धांत पर टिके रहते हैं, लेकिन अक्सर उन्हें समझौते करने पड़ते हैं ताकि वे प्रभावी रह सकें।

फिर भी, यह पूरी कहानी नहीं है। कुछ नेता या आंदोलन ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने परिस्थितियों के बावजूद सिद्धांत नहीं छोड़े जैसे महात्मा गांधी का अहिंसा पर अडिग रहना।

इसलिए ज्यादा सही निष्कर्ष शायद यह है: राजनीति में सिद्धांत दिशा देते हैं, लेकिन रास्ता अक्सर परिस्थिति तय करती हैं।

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