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Indian Railway Coolie Order27 अप्रैल 1998,W.P.(C) No. 176/1995.Railway Parcel Porters matter,
27 अप्रैल 1998,W.P.(C) No. 176/1995.Railway Parcel Porters matter,
सुप्रीम कोर्ट ने Labour Commissioner को संबंधित Parcel Porters के लगातार काम करने तथा काम के perennial nature की जाँच करने का निर्देश दिया। 2003 के फैसले में इस आदेश का विशेष उल्लेख है।
16 अक्टूबर 1998.W.P.(C) No. 90/1997.Railway Parcel & Goods Handling Mazdoor Union v. Union of India.
Labour Commissioner की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद कोर्ट ने ऐसे Porters/Workers के बारे में निर्देश दिए जो सहकारी समितियों के माध्यम से लगाए गए थे और 10 वर्ष या उससे अधिक समय से लगातार काम कर रहे थे। पात्र पाए जाने पर medical fitness और superannuation की शर्तों के अधीन regularisation/absorption का निर्देश दिया गया।
08 सितम्बर 2000/W.P.(C) No. 433/1998 में अंतरिम आदेश.A.I. Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India.
लंबित मामले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रूप से कहा कि विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर Parcel Porters का regularisation न किया जाए, चाहे किसी अन्य कोर्ट/Tribunal/authority का आदेश क्यों न हो।
22 अगस्त 2003
W.P.(C) No. 433/1998 + W.P.(C) Nos. 457/1998, 278/1999, 530/2000, 599/2000, 45/2001, 121/2000, 262/2002, 19/2003; C.A. No.57/2001; SLP(C) No.6560/2001.
A.I. Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India.यह 1995–2008 अवधि का सबसे विस्तृत निर्णय है। Court ने Assistant Labour Commissioner, Lucknow को प्रत्येक claimant की genuineness की जाँच करने और पात्र पाए जाने वाले Parcel Porters को उपलब्ध perennial work के आधार पर permanent absorption के लिए विचार करने के निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंसधारी रेलवे पोर्टरों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंसधारी रेलवे पोर्टरों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
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Supreme Court Justice |
22 अगस्त 2003 — All India Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India
यह पार्सल पोर्टरों/कॉन्ट्रैक्ट पोर्टरों के नियमितीकरण से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला था। बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सार इस प्रकार दर्ज है:
पहले यह जांच हो कि दावा करने वाले पोर्टर वास्तव में संबंधित रेलवे स्टेशनों पर काम करते थे।
पात्र पाए जाने पर रेलवे को उन्हें स्थायी रूप से absorb/regularise करना था।
नियमितीकरण उपलब्ध perennial (निरंतर) काम की मात्रा तक सीमित होना था।
नियमित रेलवे पार्सल पोर्टरों के समान न्यूनतम वेतनमान और सेवा लाभ मिलने थे।
अधिक लंबे समय तक काम कर चुके पोर्टरों को प्राथमिकता दी जानी थी।
महत्वपूर्ण अंतर: 1979 का मामला मुख्यतः licensed passenger porters की कानूनी स्थिति से जुड़ा था, जबकि 2003 का फैसला विशेष रूप से contract railway parcel porters के absorption/regularisation से संबंधित था। इसलिए हर रेलवे कुली पर 2003 का आदेश स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।
1995 से 2008 तक सुप्रीम कोर्ट के रेलवे कुली/पोर्टर संबंधी सभी प्रमुख आदेश तारीख और केस नंबर सहित क्रमवार निकाल कर दे रहा हूं।
1995–2008 : प्रमुख सुप्रीम कोर्ट आदेश/निर्णय।
क्रम संख्या (1) 09 मई 1995 W.P(C) No.507/1992 With W.P No.415/1992,82/1993&838/1992, National Federation of Railway Porters, Vendor & Bearers Vs Union of india.
रेलवे में ठेके के माध्यम से लंबे समय से काम कर रहे Parcel Porters के नियमितीकरण/स्थायी अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण आदेश। कोर्ट ने जाँच रिपोर्ट के आधार पर पात्र पोर्टरों को उपलब्ध स्थायी/परिनियल काम के अनुपात में नियमित रूप से absorb करने के निर्देश दिए।
(2) 08 जुलाई 1996 W.P.(C) Nos. 568/1995 & 711/1995.National Federation of Railway Porters' Union matters.1995 के निर्णय के बाद फिर से Parcel Porters के नियमितीकरण/अवशोषण के संबंध में निर्देश दिए गए। बाद के 2003 के सुप्रीम कोर्ट निर्णय ने इन दोनों मामलों को स्पष्ट रूप से precedent के रूप में दर्ज किया है।
(3)19 सितम्बर 1997 W.P.(C) No. 90/1997.Railway Parcel Porters matter.सुप्रीम कोर्ट ने Assistant Labour Commissioner, Calcutta को जाँच करने का निर्देश दिया कि संबंधित पोर्टर लगातार काम कर रहे थे या नहीं, काम perennial nature का था या नहीं और Contract Labour (Regulation & Abolition) Act की धारा 10 की शर्तें पूरी होती थीं या नहीं।
(4) 01 अक्टूबर 1997
Civil Appeal No. 6953/1997, arising from SLP(C) No. 19434/1996.Rashtriya Chaturth Shreni Railway Majdoor Congress (INTUC) v. Union of India.
Agra Fort Railway Station के Parcel Porters का मामला। सुप्रीम कोर्ट ने CAT का आदेश रद्द कर Tribunal को निर्देश दिया कि वह 1995 के National Federation फैसले के सिद्धांतों के आधार पर मामले का merits पर निर्णय करे।
CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल।
एनडीए सरकार पर व्यंग्य: मंत्री मालामाल, ठेकेदार मालामाल, जनता बेहाल!
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CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल क्यों। |
CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल।
नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों एक नया व्यंग्य खूब सुनाई दे रहा है—“सरकार की योजनाएं बढ़ीं, ठेकों का आकार बढ़ा, लेकिन आम आदमी की जेब का आकार वही रहा।” विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों का तंज है कि एनडीए सरकार के दौर में विकास की रफ्तार का फायदा सबसे पहले मंत्रियों और बड़े ठेकेदारों तक पहुंचता दिखाई देता है, जबकि आम जनता महंगाई, रोजगार और रोजमर्रा के खर्चों के बीच जूझ रही है।
सरकार की ओर से लगातार सड़क, रेलवे, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाने की बात कही जाती है। दूसरी ओर, CAG की विभिन्न रिपोर्टों में सरकारी परियोजनाओं और खर्चों में प्रक्रियागत कमियों तथा अनुपालन से जुड़ी टिप्पणियां भी सामने आती रही हैं।
इसी को लेकर राजनीतिक व्यंग्य में कहा जा रहा है—“ठेकेदार की फाइल दौड़ती है, भुगतान की गाड़ी दौड़ती है, लेकिन जनता की गाड़ी पेट्रोल-डीजल और महंगाई में अटक जाती है।”
हालांकि, “मंत्री मालामाल” या “ठेकेदार मालामाल” जैसे आरोपों को व्यापक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए प्रत्येक मामले में ठोस दस्तावेज और स्वतंत्र जांच जरूरी होगी। इतना जरूर है कि सरकारी खर्च में पारदर्शिता, ठेकों की निगरानी और योजनाओं का वास्तविक लाभ आम लोगों तक पहुंचना लगातार सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।
विकास की गाड़ी आखिर किसके दरवाजे तक पहुंच रही है और आम जनता उसके टिकट का किराया क्यों चुका रही है?
GST को लेकर विपक्ष का तीखा तंज, ‘मोदी का वश चले तो शौचालय जाने पर भी 18% टैक्स लगा दें।
GST को लेकर विपक्ष का तीखा तंज, ‘मोदी का वश चले तो शौचालय जाने पर भी 18% टैक्स लगा दें।
हालांकि, शौचालय के उपयोग पर 18 प्रतिशत GST लगाए जाने का कोई सरकारी प्रस्ताव सामने नहीं आया है। इसलिए यह बयान राजनीतिक व्यंग्य और सरकार की कर नीति पर कटाक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी वास्तविक GST निर्णय के रूप में।
GST की विभिन्न दरों को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस लगातार जारी रहती है। विपक्ष जहां महंगाई और कर बोझ को मुद्दा बना रहा है, वहीं सरकार GST व्यवस्था में सुधार और कर अनुपालन को लेकर अपने पक्ष पर जोर देती रही है।
जर्जर सड़कों से स्थानीय लोगों की बढ़ी परेशानी, आवागमन से लेकर कारोबार तक प्रभावित.
जर्जर सड़कों से स्थानीय लोगों की बढ़ी परेशानी, आवागमन से लेकर कारोबार तक प्रभावित.
DurgapurB.Zone Jaidev Road very Denjars
पश्चिम बंगाल। राज्य में सरकार बदलने के बाद सड़कों की जर्जर स्थिति भी स्थानीय स्तर पर चर्चा का प्रमुख विषय बनती जा रही है। कई इलाकों में सड़क पर बने गड्ढों और टूटे हिस्सों के कारण आम लोगों को रोजाना आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

DurgapurB.Zone Jaidev Road very Denjars
खराब सड़कों का असर स्कूल जाने वाले बच्चों, कामकाजी लोगों, मरीजों और छोटे कारोबारियों पर भी पड़ रहा है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए गड्ढों वाली सड़कें विशेष परेशानी का कारण बन रही हैं। वहीं, बारिश के दौरान सड़क पर पानी जमा होने से स्थिति और खराब हो जाती है।
Durgapur B.zone, Bharati Roads
स्थानीय व्यापारियों के मुताबिक, खराब सड़क और जलजमाव के कारण बाजार तक ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होती है, जिसका असर कारोबार पर भी पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की स्थिति खराब होने से किसानों को उपज मंडी तक पहुंचाने में अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ सकता है।
Durgapur B.zone Sepko Aria
स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन जर्जर सड़कों का सर्वे कर प्राथमिकता के आधार पर मरम्मत कराए और केवल अस्थायी पैचवर्क के बजाय टिकाऊ सड़क निर्माण पर ध्यान दे। अब सड़क व्यवस्था में सुधार सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए एक अहम चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
Durgapur.B.zone Chandidash.
ग्रामीण इलाकों में असर:-

Durgapur B.zone, Bharati Roads

Durgapur B.zone Sepko Aria

Durgapur.B.zone Chandidash.
गांवों में खराब सड़कों का सीधा असर किसानों, छात्रों और मरीजों पर पड़ रहा है। कृषि उपज को बाजार या मंडी तक पहुंचाने में अतिरिक्त समय लग रहा है। एंबुलेंस और अन्य जरूरी सेवाओं के आवागमन में भी परेशानी की शिकायतें सामने आती हैं। स्कूल और कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों को भी बरसात के मौसम में विशेष दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
शहरी इलाकों में असर:-
शहरों और कस्बों में जर्जर सड़कों के साथ जलजमाव की समस्या भी लोगों की परेशानी बढ़ाती है। दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, दुकानदारों और दोपहिया वाहन चालकों को रोजाना यातायात में दिक्कत होती है। कई जगहों पर गड्ढों के कारण ट्रैफिक की रफ्तार धीमी होने और वाहनों के रखरखाव का खर्च बढ़ने की शिकायतें भी सामने आती हैं।
मिस यूनिवर्स इंडिया के फिनाले में हिस्सा लेने के कुछ दिनों बाद फिर ऑफिस पहुंचीं, गूगल ऑफिस से शेयर की तस्वीर।
मिस यूनिवर्स इंडिया के फिनाले में हिस्सा लेने के कुछ दिनों बाद फिर गुगल ऑफीस पहुंचीं, गूगल ऑफिस से शेयर की तस्वीर।
2025 की मिस यूनिवर्स 2026 में गुगल में कार्य करने लौटी।
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गूगल ऑफिस से शेयर की तस्वीर। |
प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर शत्रुघ्न सिन्हा ने दी बधाई।
प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर शत्रुघ्न सिन्हा ने दी बधाई।
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तृणमूल कांग्रेस के संसद शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्म दिन की बधाई एक दिन पहले ही दे दिया। |







