22 अगस्त 2003 का फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण.

22 अगस्त 2003 का फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण.

इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कई पुराने आदेशों 15 अप्रैल 1991, 9 मई 1995, 8 जुलाई 1996 और 19 सितम्बर 1997 को एक साथ देखते हुए Parcel Porters के मामलों के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की।
मुख्य शर्तों में शामिल थीं:-
Assistant Labour Commissioner द्वारा प्रत्येक claimant के रिकॉर्ड की जाँच।
वास्तविक contract labour service की पुष्टि।
उपलब्ध perennial work के आधार पर absorption।
superannuation की आयु पूरी कर चुके व्यक्ति को absorption से बाहर रखना।
medical fitness आवश्यक होना।
लंबे समय तक काम करने वालों को अपेक्षाकृत प्राथमिकता देना।
absorption के बाद Railway के नियमित कर्मचारियों पर लागू सेवा शर्तों का पालन।
2004–2008 के बारे में महत्वपूर्ण निष्कर्ष
मेरी खोज में 2004 से 2008 के बीच 2003 के फैसले जैसा कोई नया, व्यापक सुप्रीम कोर्ट का मूल निर्णय नहीं मिला जिसने Railway Parcel Porters के नियमितीकरण के सिद्धांत को पूरी तरह बदल दिया हो। 2003 का फैसला बाद की कार्यवाही में मुख्य आधार बना रहा।
इसलिए यदि आपका उद्देश्य “1995 से 2008 तक सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे कुलियों/पोर्टरों के नियमितीकरण के बारे में क्या-क्या आदेश दिए” की कानूनी सूची तैयार करना है, तो ऊपर के 1995, 1996, 1997, 1998 और 2003 के आदेश सबसे महत्वपूर्ण हैं।
एक और महत्वपूर्ण सुधार: 1995 की मूल सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही का केस नंबर W.P.(C) No. 507/1992 with W.P. No. 415/1992, 82/1993 और 838/1992 है और निर्णय की तारीख 09.05.1995 है—इसे 1999 बताने वाले कुछ द्वितीयक स्रोतों में तारीख संबंधी गलती दिखाई देती है। 
अगर आप चाहें, मैं अगला चरण बनाकर इन सभी मामलों की पूरी “केस-वाइज कानूनी फाइल” दे सकता हूँ—हर केस में केस नंबर + तारीख + जजों की बेंच + रेलवे स्टेशन/जोन + कितने पोर्टर + सुप्रीम कोर्ट का exact operative direction + SCC/AIR citation + बाद में किस मामले में इस आदेश का पालन हुआ, ताकि इसे कोर्ट/RTI/रेलवे दावा के संदर्भ में इस्तेमाल करना.

Indian Railway Coolie Order27 अप्रैल 1998,W.P.(C) No. 176/1995.Railway Parcel Porters matter,

27 अप्रैल 1998,W.P.(C) No. 176/1995.Railway Parcel Porters matter,

सुप्रीम कोर्ट ने Labour Commissioner को संबंधित Parcel Porters के लगातार काम करने तथा काम के perennial nature की जाँच करने का निर्देश दिया। 2003 के फैसले में इस आदेश का विशेष उल्लेख है।

16 अक्टूबर 1998.W.P.(C) No. 90/1997.Railway Parcel & Goods Handling Mazdoor Union v. Union of India.

Labour Commissioner की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद कोर्ट ने ऐसे Porters/Workers के बारे में निर्देश दिए जो सहकारी समितियों के माध्यम से लगाए गए थे और 10 वर्ष या उससे अधिक समय से लगातार काम कर रहे थे। पात्र पाए जाने पर medical fitness और superannuation की शर्तों के अधीन regularisation/absorption का निर्देश दिया गया। 

08 सितम्बर 2000/W.P.(C) No. 433/1998 में अंतरिम आदेश.A.I. Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India.

लंबित मामले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रूप से कहा कि विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर Parcel Porters का regularisation न किया जाए, चाहे किसी अन्य कोर्ट/Tribunal/authority का आदेश क्यों न हो।

22 अगस्त 2003

W.P.(C) No. 433/1998 + W.P.(C) Nos. 457/1998, 278/1999, 530/2000, 599/2000, 45/2001, 121/2000, 262/2002, 19/2003; C.A. No.57/2001; SLP(C) No.6560/2001.
A.I. Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India.यह 1995–2008 अवधि का सबसे विस्तृत निर्णय है। Court ने Assistant Labour Commissioner, Lucknow को प्रत्येक claimant की genuineness की जाँच करने और पात्र पाए जाने वाले Parcel Porters को उपलब्ध perennial work के आधार पर permanent absorption के लिए विचार करने के निर्देश दिए।




सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंसधारी रेलवे पोर्टरों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंसधारी रेलवे पोर्टरों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। 

Supreme Court Justice

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे प्रशासन उनके काम, समय, दरों, वर्दी और अनुशासन को नियंत्रित करता है तथा उन्हें रेलवे की ओर से सुविधाएँ भी मिलती हैं। इस आधार पर उन्हें रेलवे की सेवा से जुड़े “workmen” माना गया।

22 अगस्त 2003 — All India Railway Parcel & Goods Porters Union v. Union of India

यह पार्सल पोर्टरों/कॉन्ट्रैक्ट पोर्टरों के नियमितीकरण से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला था। बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सार इस प्रकार दर्ज है:

पहले यह जांच हो कि दावा करने वाले पोर्टर वास्तव में संबंधित रेलवे स्टेशनों पर काम करते थे।

पात्र पाए जाने पर रेलवे को उन्हें स्थायी रूप से absorb/regularise करना था।

नियमितीकरण उपलब्ध perennial (निरंतर) काम की मात्रा तक सीमित होना था।

नियमित रेलवे पार्सल पोर्टरों के समान न्यूनतम वेतनमान और सेवा लाभ मिलने थे।

अधिक लंबे समय तक काम कर चुके पोर्टरों को प्राथमिकता दी जानी थी।

महत्वपूर्ण अंतर: 1979 का मामला मुख्यतः licensed passenger porters की कानूनी स्थिति से जुड़ा था, जबकि 2003 का फैसला विशेष रूप से contract railway parcel porters के absorption/regularisation से संबंधित था। इसलिए हर रेलवे कुली पर 2003 का आदेश स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।

1995 से 2008 तक सुप्रीम कोर्ट के रेलवे कुली/पोर्टर संबंधी सभी प्रमुख आदेश तारीख और केस नंबर सहित क्रमवार निकाल कर दे रहा हूं।

 1995–2008 : प्रमुख सुप्रीम कोर्ट आदेश/निर्णय।

क्रम संख्या (1) 09 मई 1995 W.P(C) No.507/1992 With W.P No.415/1992,82/1993&838/1992, National Federation of Railway Porters, Vendor & Bearers Vs Union of india.

रेलवे में ठेके के माध्यम से लंबे समय से काम कर रहे Parcel Porters के नियमितीकरण/स्थायी अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण आदेश। कोर्ट ने जाँच रिपोर्ट के आधार पर पात्र पोर्टरों को उपलब्ध स्थायी/परिनियल काम के अनुपात में नियमित रूप से absorb करने के निर्देश दिए।

(2) 08 जुलाई 1996 W.P.(C) Nos. 568/1995 & 711/1995.National Federation of Railway Porters' Union matters.1995 के निर्णय के बाद फिर से Parcel Porters के नियमितीकरण/अवशोषण के संबंध में निर्देश दिए गए। बाद के 2003 के सुप्रीम कोर्ट निर्णय ने इन दोनों मामलों को स्पष्ट रूप से precedent के रूप में दर्ज किया है।

(3)19 सितम्बर 1997 W.P.(C) No. 90/1997.Railway Parcel Porters matter.सुप्रीम कोर्ट ने Assistant Labour Commissioner, Calcutta को जाँच करने का निर्देश दिया कि संबंधित पोर्टर लगातार काम कर रहे थे या नहीं, काम perennial nature का था या नहीं और Contract Labour (Regulation & Abolition) Act की धारा 10 की शर्तें पूरी होती थीं या नहीं।

(4) 01 अक्टूबर 1997

Civil Appeal No. 6953/1997, arising from SLP(C) No. 19434/1996.Rashtriya Chaturth Shreni Railway Majdoor Congress (INTUC) v. Union of India.

Agra Fort Railway Station के Parcel Porters का मामला। सुप्रीम कोर्ट ने CAT का आदेश रद्द कर Tribunal को निर्देश दिया कि वह 1995 के National Federation फैसले के सिद्धांतों के आधार पर मामले का merits पर निर्णय करे।





CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल।

एनडीए सरकार पर व्यंग्य: मंत्री मालामाल, ठेकेदार मालामाल, जनता बेहाल!

CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल क्यों।

CAG की रिपोर्टों में सरकारी खर्च पर सवाल।
नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों एक नया व्यंग्य खूब सुनाई दे रहा है—“सरकार की योजनाएं बढ़ीं, ठेकों का आकार बढ़ा, लेकिन आम आदमी की जेब का आकार वही रहा।” विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों का तंज है कि एनडीए सरकार के दौर में विकास की रफ्तार का फायदा सबसे पहले मंत्रियों और बड़े ठेकेदारों तक पहुंचता दिखाई देता है, जबकि आम जनता महंगाई, रोजगार और रोजमर्रा के खर्चों के बीच जूझ रही है।
सरकार की ओर से लगातार सड़क, रेलवे, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाने की बात कही जाती है। दूसरी ओर, CAG की विभिन्न रिपोर्टों में सरकारी परियोजनाओं और खर्चों में प्रक्रियागत कमियों तथा अनुपालन से जुड़ी टिप्पणियां भी सामने आती रही हैं।
इसी को लेकर राजनीतिक व्यंग्य में कहा जा रहा है—“ठेकेदार की फाइल दौड़ती है, भुगतान की गाड़ी दौड़ती है, लेकिन जनता की गाड़ी पेट्रोल-डीजल और महंगाई में अटक जाती है।”
हालांकि, “मंत्री मालामाल” या “ठेकेदार मालामाल” जैसे आरोपों को व्यापक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए प्रत्येक मामले में ठोस दस्तावेज और स्वतंत्र जांच जरूरी होगी। इतना जरूर है कि सरकारी खर्च में पारदर्शिता, ठेकों की निगरानी और योजनाओं का वास्तविक लाभ आम लोगों तक पहुंचना लगातार सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।
विकास की गाड़ी आखिर किसके दरवाजे तक पहुंच रही है और आम जनता उसके टिकट का किराया क्यों चुका रही है?


GST को लेकर विपक्ष का तीखा तंज, ‘मोदी का वश चले तो शौचालय जाने पर भी 18% टैक्स लगा दें।

GST को लेकर विपक्ष का तीखा तंज, ‘मोदी का वश चले तो शौचालय जाने पर भी 18% टैक्स लगा दें।

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में 100 में 100% समानों में 18% जीएसटी लगाया गया, रेलवे स्टेशनों पर शौचालय करने पर भी 18% जीएसटी यात्रियों को देना पर रहा है। फिर भी सरकार कह रही है कि मैं देश का विकास कर रहा हूं।

नई दिल्ली। GST को लेकर राजनीतिक बहस के बीच विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं ने सरकार की कर व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा कि “अगर मोदी का वश चले तो शौचालय करने पर भी 18 प्रतिशत GST लागू कर दें।”

विपक्ष का आरोप है कि सरकार की कर नीतियों का असर आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ रहा है। इसी मुद्दे को लेकर विपक्षी नेताओं ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि आने वाले समय में लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी टैक्स चुकाना पड़ सकता है।

हालांकि, शौचालय के उपयोग पर 18 प्रतिशत GST लगाए जाने का कोई सरकारी प्रस्ताव सामने नहीं आया है। इसलिए यह बयान राजनीतिक व्यंग्य और सरकार की कर नीति पर कटाक्ष के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी वास्तविक GST निर्णय के रूप में।

GST की विभिन्न दरों को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस लगातार जारी रहती है। विपक्ष जहां महंगाई और कर बोझ को मुद्दा बना रहा है, वहीं सरकार GST व्यवस्था में सुधार और कर अनुपालन को लेकर अपने पक्ष पर जोर देती रही है।


जर्जर सड़कों से स्थानीय लोगों की बढ़ी परेशानी, आवागमन से लेकर कारोबार तक प्रभावित.

जर्जर सड़कों से स्थानीय लोगों की बढ़ी परेशानी, आवागमन से लेकर कारोबार तक प्रभावित.

DurgapurB.Zone Jaidev Road very Denjars

पश्चिम बंगाल। राज्य में सरकार बदलने के बाद सड़कों की जर्जर स्थिति भी स्थानीय स्तर पर चर्चा का प्रमुख विषय बनती जा रही है। कई इलाकों में सड़क पर बने गड्ढों और टूटे हिस्सों के कारण आम लोगों को रोजाना आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

खराब सड़कों का असर स्कूल जाने वाले बच्चों, कामकाजी लोगों, मरीजों और छोटे कारोबारियों पर भी पड़ रहा है। दोपहिया वाहन चालकों के लिए गड्ढों वाली सड़कें विशेष परेशानी का कारण बन रही हैं। वहीं, बारिश के दौरान सड़क पर पानी जमा होने से स्थिति और खराब हो जाती है।

Durgapur B.zone, Bharati Roads


स्थानीय व्यापारियों के मुताबिक, खराब सड़क और जलजमाव के कारण बाजार तक ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होती है, जिसका असर कारोबार पर भी पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की स्थिति खराब होने से किसानों को उपज मंडी तक पहुंचाने में अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ सकता है।

Durgapur B.zone Sepko Aria

स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन जर्जर सड़कों का सर्वे कर प्राथमिकता के आधार पर मरम्मत कराए और केवल अस्थायी पैचवर्क के बजाय टिकाऊ सड़क निर्माण पर ध्यान दे। अब सड़क व्यवस्था में सुधार सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए एक अहम चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

Durgapur.B.zone Chandidash.

ग्रामीण इलाकों में असर:-


गांवों में खराब सड़कों का सीधा असर किसानों, छात्रों और मरीजों पर पड़ रहा है। कृषि उपज को बाजार या मंडी तक पहुंचाने में अतिरिक्त समय लग रहा है। एंबुलेंस और अन्य जरूरी सेवाओं के आवागमन में भी परेशानी की शिकायतें सामने आती हैं। स्कूल और कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों को भी बरसात के मौसम में विशेष दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।


शहरी इलाकों में असर:-


शहरों और कस्बों में जर्जर सड़कों के साथ जलजमाव की समस्या भी लोगों की परेशानी बढ़ाती है। दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, दुकानदारों और दोपहिया वाहन चालकों को रोजाना यातायात में दिक्कत होती है। कई जगहों पर गड्ढों के कारण ट्रैफिक की रफ्तार धीमी होने और वाहनों के रखरखाव का खर्च बढ़ने की शिकायतें भी सामने आती हैं।

मिस यूनिवर्स इंडिया के फिनाले में हिस्सा लेने के कुछ दिनों बाद फिर ऑफिस पहुंचीं, गूगल ऑफिस से शेयर की तस्वीर।

मिस यूनिवर्स इंडिया के फिनाले में हिस्सा लेने के कुछ दिनों बाद फिर गुगल ऑफीस पहुंचीं, गूगल ऑफिस से शेयर की तस्वीर।

2025 की मिस यूनिवर्स 2026 में गुगल में कार्य करने लौटी।

गूगल ऑफिस से शेयर की तस्वीर।

मिस यूनिवर्स इंडिया के फिनाले में हिस्सा लेने के बाद कुछ दिनों तक चर्चा में रहीं प्रतियोगिता की प्रतिभागी अब अपने नियमित पेशेवर जीवन में लौट आई हैं। फिनाले के कुछ दिन बाद वह दोबारा गूगल ऑफिस में अपने काम पर पहुंचीं।

प्रतियोगिता की प्रतिभागी अब अपने नियमित पेशेवर जीवन में लौट आई हैं।ऑफिस लौटने के बाद उन्होंने गूगल ऑफिस से अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की। तस्वीर सामने आने के बाद उनके फैंस और सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान उनके इस नए अंदाज पर गया।

फिनाले के दौरान जहां वह सौंदर्य प्रतियोगिता का हिस्सा बनी थीं, वहीं इसके कुछ ही दिनों बाद उनका फिर से कॉरपोरेट प्रोफेशन में लौटना चर्चा का विषय बन गया है। इससे यह भी सामने आता है कि मिस यूनिवर्स इंडिया प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बावजूद उन्होंने अपने पेशेवर करियर को जारी रखा है।

प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर शत्रुघ्न सिन्हा ने दी बधाई।

प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर शत्रुघ्न सिन्हा ने दी बधाई।

तृणमूल कांग्रेस के संसद शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्म दिन की बधाई एक दिन पहले ही दे दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन 17 सितंबर को होता है। उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था।

कोलकाता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद और अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने उन्हें बधाई दी। सिन्हा ने प्रधानमंत्री के स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए जन्मदिन की शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण अवसरों पर शुभकामनाएं देना लोकतांत्रिक शिष्टाचार का हिस्सा है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर से भी शुभकामनाएं दिए जाने का सिलसिला जारी रहा।

N. Mari बनाम Ministry of Railways का 7 मार्च 2025 का फैसला Central Administrative Tribunal (CAT), चेन्नई बेंच का फैसला है।

N. Mari बनाम Ministry of Railways का 7 मार्च 2025 का फैसला  Central Administrative Tribunal (CAT), चेन्नई बेंच का फैसला है।
बी जे पी सरकार से उम्मीद नहीं करें

भारतीय जनता पार्टी की सरकार से रेलवे कुली अपने बच्चों के भविष्य बेहतर बनाने के लिए उम्मीद नहीं करें।

फैसले में क्या हुआ?

मामला N. Mari @ Mariappan, जॉलेरपेट रेलवे स्टेशन के लाइसेंसधारी कुली-पोर्टर का था। उन्होंने रेलवे बोर्ड के RBE No. 50/2008, दिनांक 1 अप्रैल 2008 के आधार पर उन्हें Gangman (बाद में Trackman) के पद पर नियुक्त करने की मांग की थी। 

Indian Kanoon:- भारतीय कानून ?

रेलवे बोर्ड की 2008 की योजना के तहत उस समय कुछ शर्तें पूरी करने वाले लाइसेंसधारी कुलियों को एकमुश्त आधार पर Gangman पद पर नियुक्त करने का प्रावधान किया गया था। इनमें 26 फरवरी 2008 को वैध लाइसेंस, 18–50 वर्ष की आयु, मेडिकल फिटनेस और स्क्रीनिंग जैसी शर्तें थीं। नियुक्ति होने पर कुली का लाइसेंस और बैज छोड़ना था। 
N. Mari की नियुक्ति इसलिए रोक दी गई थी क्योंकि उनके पिता के नाम पुराने बैज नंबर 10 और उनके पास मौजूद बैज नंबर 13 को लेकर रेलवे रिकॉर्ड में विसंगति थी। CAT ने माना कि बैज नंबर 13 रेलवे अधिकारियों ने ही जारी किया था और इस विसंगति के लिए कुली को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। 

Indian Kanoon:-
CAT का आदेश:-

CAT ने 6 सितंबर 2017 के रेलवे के आदेश को रद्द कर दिया और रेलवे को निर्देश दिया कि N. Mari के मामले पर RBE No. 50/2008 के तहत पुनर्विचार करके उन्हें Gangman के पद पर नियुक्त किया जाए और नियमानुसार संबंधित लाभ दिए जाएं। इसके लिए तीन महीने की समय-सीमा दी गई थी।
इसलिए इस मामले को “सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे कुलियों को स्थायी नौकरी देने का फैसला दिया” कहना सही नहीं होगा। सही तथ्य यह है कि 7 मार्च 2025 को CAT चेन्नई बेंच ने एक लाइसेंसधारी कुली के व्यक्तिगत मामले में रेलवे को नियुक्ति पर पुनर्विचार/नियुक्ति का आदेश दिया। 



सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट/2024/2026/CAT/ का फैसला/ भारत के वर्तमान रेलवे कुलियों को 2008 के आधार पर ग्रुप डी शामिल करने का आदेश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट/हाईकोर्ट 2024/2026/CAT/ का फैसला/ रेलवे कुली/वनाम  रेलवे बोर्ड के /वर्तमान रेलवे कुलियों को 2008 के आधार पर ग्रुप डी शामिल करने का आदेश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट कैट/2024/2026 के निर्देशानुुसार 26-02-2008 तक वैध लाईसेंस धारकों को ग्रुप डी में नियुक्ति करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट एवंं चेन्नई हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है। रेलवे बोर्ड एवं रेलमंत्री की मनमानी के कारण  अभी तक वैध लाईसेंस धारकों की नियुक्ति नहीं हो सक रही है।